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लुप्त होती चिट्ठी लिखने की विधा को बचाने का अनूठा अभियान। पढ़ें क्या है खास?

लुप्त होती चिट्ठी लिखने की विधा को बचाने का अनूठा अभियान। पढ़ें क्या है खास?

आज अन्तर्राष्ट्रीय पत्र दिवस है  भावनाओं से गुथी चिट्ठियां लिखने की  विधा को बचाने के लिए इस अभियान की शुरुआत डेढ़ दशक पहले एक पत्रकार ने की थी और अब इससे देश भर में हजारो लोग जुड़ गए।
ग्वालियर/ भोपाल । चिट्ठी लिखने की लुप्त होती विधा को बचाने के मकसद 31 जुलाई को ग्वालियर में हर वर्ष ग्रामीण पत्रकारिता दिवस पर आयोजित होनर वाला कार्यक्रम कोविड महामारी को रोकने के लिए लागू प्रोटोकॉल के कारण आज लगातार दूसरे वर्ष भी आयोजित नही हो सका लेकिन इस अभियान और संस्था से जुड़े लोगों ने देशभर से अपने प्रियजनों को पोस्टकार्ड लिखकर इसे निरन्तरता नही दी ।
ग्रामीण पत्रकारिता विकास संस्थान के अध्यक्ष देव श्रीमाली ने बताया कि संस्था के सदस्यों ने देशभर में आज अपने प्रियजनों को पैन,पेंसिल से पत्र लिखकर उसमे अपनी भावनाओं को समाहित किया। पत्र लिखने वाले प्रमुख लोगों में सांसद विवेक नारायण शेजवलकर, भाजपा के जिला अध्यक्ष कमल माखीजानी , कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक सिंह सहित अनेक पत्रकार,साहित्यकार और समाजसेवी शामिल रहे ।
ऐसे हुई शुरुआत 

वैसे पत्र लेखन कोई ऐसी विधा नहीं है जिसके बारे में किसी को विस्तार से बहुत कुछ बताने की जरूरत हो लेकिन बदलाव के इस समय चक्र में क्या पत्र लेखन प्रति हम आप और आने वाली पीढ़ी संजीदा है ? सवाल एक यह भी है कि आज के इस दौर में खत लिखने की संजीदगी की जरूरत भी क्या है ? इस नजरिए से देखेंगे तो जवाब एक लाइन में खत्म होने की गुंजाइश रखता है। लेकिन अगर इस विषय पर वाकई में संजीदगी से विचार किया जाए और ख़त लिखकर और लिखे हुए खत को पढ़कर महसूस होने वाली अनुभूति को महसूस किया जाए तो फिर यह कहना लाजिमी होता है कि काश वह खत आज भी डाकिए के हाथों घर पर आ रहे होते । बस इसी एहसास को बनाए रखने के लिए हर साल 31 जुलाई को अंतर्राष्ट्रीय पत्र दिवस मनाने की पहल शुरू की गई है।

 

इस मुहिम के अगुआ  पत्रकार शरद श्रीवास्तव हर साल इस दिन ग्वालियर में ग्रामीण पत्रकारिता विकास संस्थान के सहयोग से एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन जागरूकता के लिहाज से करते थे लेकिन कोरोना काल की विषम परिस्थितियों की वजह से इस साल यह आयोजन संभव नहीं हो सका लेकिन संस्थान के सदस्यों की ओर से इस बार भी लोगों को जागरूक करने के लिए व्यक्तिगत तौर पर संदेश भेजे गए और पोस्ट कार्ड का वितरण किया गया । अंतर्राष्ट्रीय पत्र दिवस कार्यक्रम के आयोजन का मकसद भी दरअसल लोगों को पत्र लिखने के प्रति जागरूक करना था।

यह अभियान बीते कई सालों से लगातार जारी है और लोग इससे जुड़ भी रहे हैं। युवा पीढ़ी का भी यह मानना है कि भले आधुनिकता की दौड़ में मोबाइल गैजेट्स जिंदगी का अहम हिस्सा बन गए हो लेकिन अगर एक दिन पत्र लिखकर अतीत के एहसास को बनाए रखा जाए तो फिर इसमें गुरेज नहीं है।

यह वक्त तो कोरोना की विषम परिस्थितियों का है लिहाजा आयोजन से संबंधित विस्तृत जानकारियां यहां नहीं है लेकिन इसी उम्मीद के साथ कि कोरोना खत्म होगा और जिंदगी सामान्य पटरी पर लौटेगी तो फिर अंतरराष्ट्रीय पत्र दिवस के आयोजन की जानकारी आप सब तक निश्चित तौर पर पहुंचाई जाएगी लेकिन तब तक इस अनुरोध के साथ कि अंतरराष्ट्रीय पत्र दिवस पर खत लिखने की परंपरा को बरकरार रखें और 31 जुलाई को एक खत अपने किसी खास को पोस्ट जरूर करें।

सभी फ़ोटो पुराने संदर्भ से लिये गए हैं

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