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क्यों वे अहमद भी थे और पटेल भी

क्यों वे अहमद भी थे और पटेल भी

अहमद पटेल कांग्रेस की सियासत में एक अलग ओहदा रखते थे । साफ कपड़े पहनना और उतनी ही साफ राजनीतिक गोटियां बिठाना उनका सबसे बड़ा गुण था । वे निर्विवाद रहकर भी सबके साथ अच्छे संबंध रखते थे। उनके व्यक्तित्व को समझा रहे है वरिष्ठ पत्रकार राकेश अचल

कांग्रेस संगठन की मेरुदंड कहे जाने वाले अहमद पटेल नहीं रहे .पटेल साहब अपने नाम के अनुरूप भाग्यशाली भी थे और प्रशंसनीय भी .71 साल के अहमद पटेल ने अपने जीवन का आधे से ज्यादा हिस्सा कांग्रेस को दिया .वे पंचायत से संसद तक का सफर करने वाले ऐसे नेता थे जिन्होंने न विचारधारा छोड़ी और पार्टी .वे हर समय पार्टी के संकटमोचक बने रहे .
अहमद पटेल से मेरा कोई सीधा परिचय नहीं था,लेकिन उन्हें कांग्रेस के बड़े नेताओं के यहां आते-जाते बतियाते देखा था. उनका आकलन करने के लिए ये सब बहुत कम है लेकिन जो सामने है और जाना ,समझा जा सकता है उसके हिसाब से अहमद पटेल कांग्रेस की उस पीढी के नेता थे जिसने आपातकाल के बाद हुए उखड़ी कांग्रेस का न केवल झंडा उठाये रखा बल्कि जीवन की अंतिम सांस तक उसे सम्हाले भी रखा .पार्टी के लिए सब कुछ यानि सब कुछ करने के लिए तत्पर रहने वाले नेता अहमद पटेल का जाना कांग्रेस के लिए एक बड़ा सदमा हो सकता है ,क्योंकि आज कांग्रेस 1977 से भी ज्यादा बुरी अवस्था में है .
भरूच [गुजरात] के इस दिग्गज नेता ने तीन बार लोकसभा और पांच बार राजयसभा की शोभा बढ़ाई.वे 2017 में तो गुजरात से राजयसभा के लिए पूरी भाजपा और भारत सरकार के विरोध के बावजूद चुनकर आये थे .अहमद को न पार्टी हाईकमान के जादुई नेतृत्व की जरूरत पड़ी और न किसी अन्य की,वे अपना जुगाड़ खुद कर लेते थे .उनका यही सामर्थ्य कांग्रेस को हर संकट के समय में सहारा देता रहा .पटेल ने स्वर्गीय इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी,सोनिया गाँधी और आज के राहुल गांधी को भी आँख बंद कर अपना नेता माना ,जबकि कांग्रेस में आज जो हालात हैं उनके चलते उन्हें बहुत पहले कांग्रेस से बाहर हो जाना चाहिए था .
देश में कांग्रेस को 2004 और 2009 में सत्ता में बनाये रखने की रणनीति के पीछे अहमद पटेल का श्रम किसी से छिपा नहीं है .वे पार्टी नेतृत्व के सलाहकार भी थे और संकट मोचक भी थी. पार्टी में उनके हमउम्र तमाम नेता उनकी इस क्षमता और पोजीशन से ईर्ष्या भी करते होंगे लेकिन उन्होंने कभी किसी की परवाह नहीं की .देश के तमाम शीर्ष औद्योगिक घरानों से उनके रिश्ते थे ,जो हमेशा पार्टी के हित में काम आते रहे .पटेल मृदुभाषी तो थे ही गंभीर और दृढ़निश्चयी भी खूब थे ,उनका प्रबंधकीय कौशल आज के प्रधानमंत्री के सामने भी फीका नहीं पड़ा .
आपको तीन साल पहले हुए राजयसभा चुनाव का वो परिदृश्य शायद याद होगा जब गुजरात में राज्य सभा के लिए 176 विधायकों को वोट देना था. एक सीट जीतने के लिए कम से कम 45 विधायकों के वोट की जरूरत थी. मगर जब वोटिंग की बारी आई तो कांग्रेस के दो विधायकों राघवजी पटेल और भोला भाई गोहिल ने ही दगा दे दी. ये दोनों उन्हीं 44 विधायकों में थे, जिन्हे कांग्रेस ने कैद कर रखा था. मगर दगा देने वाले विधायक क्रॉस वोटिंग करते वक्त ये भूल गए कि वे अब भी कांग्रेस के ही सदस्य हैं और अपने वोटों का सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं कर सकते. बस इसी बात को कांग्रेस ने पकड़ लिया और चुनाव आयोग में इनके वोट रद करने की मांग जोरदारी से की. इसे चुनाव आयोग ने मान भी लिया और दोनों के वोट कैंसल कर दिए. ऐसा करते ही राज्यसभा पहुंचने के लिए मैजिक नंबर 45 से घटकर 44 रह गया. फिर पटेल को 44 ही वोट मिले और वह जीतने में कामयाब रहे.
अहमद पटेल जिस तरिके के नेता थे वैसे नेता कम ही होते हैं.एक समय में भाजपा के पास उन्हीं जैसे एक नेता प्रमोद महाजन हुआ करते थे ,लेकिन प्रमोद महाजन और अहमद पटेल की तुलना नहीं की जा सकती .पटेल अहमद थे और महाजन प्रमोद .सबको खुश रखने की कला का समय दोनों में था .ये बात अलग है की अहमद पटेल कांग्रेस को गुजरात में कांग्रेस को सत्ता में वापस नहीं ला पाए किन्तु उन्होंने अपने जीते जी कांग्रेस को गुजरात में निर्मूल भी नहीं होने दिया .कांग्रेस नेतृत्व पर होने वाले तमाम हमले अहमद ने खुद झेले ,लेकिन कभी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी .
उन दिनों मै नया-नया पत्रकार बना था लेकिन मुझे याद है कि 1977 के चुनाव में जब इंदिरा को भी पासा पलटने की आशंका थी, तब ये अहमद पटेल ही थे, जो उन्हें अपनी विधानसभा सीट पर चुनाव सभा आयोजित करने के लिए राजी कर लाए थे. 1977 के आम चुनाव में जब कांग्रेस औंधे मुंह गिरी थी और गुजरात ने उसकी कुछ साख बचाई थी, तो अहमद उन मुट्ठीभर लोगों में एक थे, जो संसद पहुंचे थे. 1980 के चुनाव में जोरदार वापसी करने के बाद जब इंदिरा ने अहमद को कैबिनेट में शामिल करना चाहा, तो उन्होंने संगठन में काम करने को प्राथमिकता दी.
कांग्रेस में आज जबकि कुरसी से चिपके रहने की प्रतिस्पर्द्धा है तब राजीव गांधी ने भी 1984 चुनाव के बाद अहमद को मंत्रीपद देना चाहा, लेकिन अहमद ने फिर पार्टी को चुना. राजीव के रहते उन्होंने युवक कांग्रेस का राष्ट्रीय नेटवर्क तैयार किया, जिसका सबसे ज्यादा फायदा सोनिया को मिला. अहमद के आलोचक कहते हैं कि वो आज जो भी हैं, गांधी परिवार के प्रति अपनी न डिगने वाली निष्ठा की वजह से हैं, जिस पर कोई सवाल नहीं उठा सकता. अहमद के राजीव के साथ मतभेद चाहे जैसे रहे हों, लेकिन वे राजीव गांधी के अनन्य प्रशंसक थे , इस पर कोई संदेह नहीं है. वे जब भी राजीव गांधी के बारे में बात करते उनकी आंखें छलक जाती . गांधी परिवार के इतना करीब रहते हुए अहमद ने सीखा कि सत्ता में न रहते हुए भी सत्ता में कैसे रहा जाता है.
अहमद पटेल कांग्रेस कि आज कि पीढ़ी के लिए प्रेरणा के स्रोत बनाये जा सकते हैं ,लेकिन सवाल ये है कि उनके जाने से जो शून्य कांग्रेस में आया है उसे कौन भर पायेगा ,क्योंकि सबके लिए ‘अहमद’और ऊपर से ‘पटेल’ हो पाना आसान काम नहीं है .आज की राजनीति में या तो वे बने रह सकते हैं जो ठकुरसुहाती करना जानते हैं या वे जिन्हें मौन रहना आता है. अहमद पटेल इन सब गुणों से अलग मेधा वाले नेता थे .वे हवा-हवाई नेता नहीं थे .उनका अपना आधार था,जिसे राजनीति में जनाधार कहा जाता है .कांग्रेस के ऐसे नेता के प्रति विनम्र श्रृद्धांजलि .
@ राकेश अचल

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