Sunday, January 17, 2021
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रघु ठाकुर बता रहे हैं सियासत में क्या गुल खिलायेगा गुप्कार और लव जिहाद

जाने -माने राजनीतिक विश्लेषक और गांधीवादी चिंतक रघु ठाकुर बता रहे है कि भाजपा ने कैसे अगले विधानसभा चुनावों के लिए एजेंडा सेट करके गृहमंत्री अमित शाह पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के दौरे पर रियाज़ के लिए निकल भी पड़े हैं

ऐसा लगता है कि भाजपा ने अपने आगामी चुनाव के लिये एजेंडा तय कर उसका प्रचार शुरू कर दिया है। देश के गृहमंत्री श्री अमित शाह ने पश्चिम बंगाल के चुनाव अभियान में और उसके पहले बिहार विधानसभा के चुनाव में भी गुपकार समूह की चर्चा शुरू की। इस गुपकार समूह का अर्थ है कि वे दल जो महबूबा मुफ्ती के रिहा होने के बाद आगामी चुनाव और कश्मीर के बारे में अपने निर्णय के लिए डाॅक्टर फारूख अब्दुल्ला के घर इकट्ठे हुए। चूंकि उनका निवास जिस इलाके में है उसे गुपकार के नाम से जाना जाता है अतः मीडिया ने इसे गुपकार समूह का नाम दिया। इस बैठक में उपस्थित नेताओं ने धारा 370 को पुनः बहाल करने की और कश्मीर की लगभग एक वर्ष पूर्व की स्थितियों को वापस लाने के लिए एकजुट होकर चुनाव लड़ने का फैसला किया। इस गुपकार समूह की बैठक और फैसले जिस समय और जिस अंदाज में हुए, उसमें उन्हें या कश्मीर को कितना लाभ होगा? यह तो भविष्य के गर्भ में है परंतु भाजपा को बकाया देश में हिन्दू मानस को उत्तेजित करके एकजुट करने और वोट में बदलने का हथियार जरूर मिल गया है।

हालांकि गुपकार समूह भी बनते ही कुछ बिखराव का शिकार हुआ। भीम सिंह की पैन्थर्स पार्टी जो श्रीनगर के इलाके में कोई जनाधार की पार्टी नहीं है और अब जम्मू के इलाके में भी उसे कोई विशेष समर्थन नहीं है शायद पर्याप्त तरजीह नहीं मिलने से कुछ असंतुष्ट हुई है। महबूबा मुफ्ती के एक पुराने सहयोगी ने भी शायद सीटों के बंटवारे को लेकर असंतुष्ट होकर समूह छोड़ दिया है। वैसे भी जम्मू कश्मीर अब तीन राज्यों में बंट चुका है- कश्मीर यानी श्रीनगर, जम्मू और लेह-लद्दाख।

श्रीनगर को छोड़कर शेष दो राज्यों में गुपकार समूह की कोई उपस्थिति प्रभावी होने की सम्भावना नहीं है बल्कि गुपकार समूह बनने से भाजपा को इन दो राज्यों में मतों के ध्रुवीकरण होने का लाभ हो सकता है। वैसे भी जाने अनजाने गुपकार समूह से भाजपा को बगैर कुछ किये फायदा मिलना है क्योंकि वे अपने प्रचार में यह आधार बनाएँगे कि हमने कश्मीर को भारत में मिलाया था और अब ये लोग इसे वापस करना चाहते हैं।

गुपकार समूह में सीपीएम की शाखा जो वस्तुतः श्रीनगर यानी कश्मीर में सीमित रही है और उसका नेतृत्व भी कश्मीरी मुस्लिम भाई के पास है, इस समूह की सहयोगी बनी है। इससे सीपीएम को श्रीनगर के इलाके में एकाध सीट मिल सकती है परंतु बकाया देश में तो भाजपा को ही लाभ होगा। पश्चिम बंगाल के चुनाव में भी अगर वे गुपकार समूह की लाइन को चलायेंगे तो वे भाजपा के हिन्दू ध्रुवीकरण और ममता की टीएमसी के मत विभाजन का ही हथियार बनेंगे। वैसे भी अब पश्चिम बंगाल में उनका प्रकट लक्ष्य भले ही भाजपा को कमजोर करना बताते हों परंतु वास्तविक लक्ष्य तो ममता को कमजोर करना है और चाहे अनचाहे भाजपा को छिपा सहयोग पहुंचाना है। अगर वे सैद्धांतिक रास्ते पर होते तो फिर पश्चिम बंगाल में ममता और कांग्रेस अलग खड़े होते परंतु उनकी योजना बकाया देश के समान कांग्रेस के साथ जाने की और ममता के खिलाफ की है। इसके बाबजूद सीपीएम-कांग्रेस गठजोड़ ममता बनर्जी के अल्पसंख्यक जनाधार को और अल्पसंख्यक की भयभीत मानसिकता के समर्थन को कोई विशेष नुकसान पहुंचाते नजर नहीं आ रहे हैं।

गुपकार समूह के जो प्रमुख स्तंभ हैं वे कभी न कभी भाजपा के सहयोगी रहे हैं। भले ही भाजपा ने 1989 में जब रूबिया सईद का अपहरण आतंकवादियों ने किया था तथा बतौर प्रधानमंत्री स्व. वी पी सिंह और बतौर गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने आतंकवादियों से समझौता कर रूबिया सईद को रिहा कराया था तब भाजपा ने इसकी घोर आलोचना की थी तथा हिन्दू मानस को मुस्लिम विरोधी बनाने का काम किया था।

मैं आतंकवादियों के साथ समझौते का तब भी विरोधी था और बाद में हैभी जब कंधार विमान अपहरण कांड के यात्रियों को छुड़ाने के नाम पर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, आड़वाणी, जसवंत सिंह ने आतंकी सरगना मसूद अजहर को न केवल रिहा किया था बल्कि ससम्मान पगड़ी भेंट के साथ वापस भिजवाया था। हालांकि जो भाजपा रूबिया सईद की रिहाई के लिए आतंकवादियों की रिहाई के खिलाफ थी। वहीं कंधार विमान कांड में आतंकवादियों के पक्ष में बोल रही थी। महबूबा मुफ्ती ने तो यह तक योजना बनाई थी कि पाकिस्तान से आने वाले लोगों के लिए उनकी पुरानी जमीनें वैधानिक तौर पर वापस दे दी जाएँगी। यह निर्णय वह इसलिए कर सकीं थीं क्योंकि वे भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री बनीं थीं और भाजपा के मंत्री उस सरकार में सहयोगी थे। यहाँ पर मुझे यह घटना दर्ज कराना जरूरी है कि 2014 में श्री नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद झंड़ेवालान में एक बैठक रखी गई थी जिसमें मुझे श्री रामबहादुर राय ने निमंत्रित किया था ।इसका उद्देश्य कश्मीर के बारे में चर्चा था।यद्यपि मैं इस बैठक में शामिल नहीं हुआ था। परंतु उस समय जम्मू कश्मीर में विधानसभा चुनाव होने वाले थे और मैंने यह अवश्य कहा था और कई जगह लिखा भी कि महबूबा मुफ्ती और फारूख के साथ सरकार बनाना राष्ट्रवाद की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। परंतु भाजपा का राष्ट्रवाद सत्ता का अवसरवाद है और फिल्हाल तो देश के हिन्दू मतदाता उनकी मानसिक गिरफ्त में हैं।

हमारे देश के हिन्दू और मुस्लिम मतदाता समूह के साथ यह आम समस्या है कि वे भयभीत होकर वोट देते हैं और अंदरखाने अपनी अपनी श्रेष्ठता और सत्ता में भागीदारी के लिए सिद्धान्तहीनता को वोट देते हैं। इसलिये हिन्दू मतदाता ने भाजपा-महबूबा के गठजोड़ पर भी मूक सहमति दी और गठजोड़ तोड़ने पर भी।

श्री फारूख अब्दुल्ला और उनके साहबजादे श्री उमर अब्दुल्ला समय समय पर भाजपा के सहयोगी रहे हैं। श्री फारूख ने तो छिंदबाड़ा के उपचुनाव में आकर भाषण दिया था जब वे स्व. अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री भी थे कि भारत और पाकिस्तान के बीच एलओसी को सीमारेखा माना जाना चाहिए। मैंने इसका विरोध किया था परंतु बाजपेयी जी ने मूक सहमति दे दी तथा श्री फारूख अब्दुला मंत्रिमंडल के अंग बने रहे। वरना ऐसे राष्ट् की सीमाओं को बलात कब्जे वालों को देने के बयान के बाद भी मंत्री पद पर कैसे रहते।

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने तो अपनी दलीय लाइन को बढ़ाते हुए 20 नवंबर को पत्रकार वार्ता में गुपकार संगठन की आलोचना करते हुये कहा कि अब्दुल्लाओं, मुफ्तिओं व गांधियों ने एकजुट होकर कश्मीर में जहर घोला है। इस एकजुटता को बताते समयउन्होंने भाजपा-मुफ्ती, भाजपा-फारूख एकजुटता को नजरअंदाज कर दिया।

कई दशकों की कसरत के बाद अब भाजपा का लव-जेहाद का मुद्दा भी पक चुका है और आगामी चुनाव में यह अभियान का मुद्दा रहेगा। लव जेहाद के मुद्दे पर भाजपा ऐसे बता रही है कि मुस्लिम लोग अपनी मत संख्या बढ़ाने के लिए हिन्दू लड़कियों से प्रेम करते हैं, उन्हें फंसाते हैं और धर्मान्तरण कराकर अपनी संख्या बढ़ाते हैं। हिन्दू-मुसलमान लड़की लड़कों के बीच पिछले तीन चार दशक में जो विवाह हुए हैं उनकी मेरे ख्याल से कोई बड़ी संख्या नहीं होगी। कई बार लोग यह करते हैं औरअकसर धर्मपरि वर्तन का इस्तेमाल बहुविवाह कानून के अपराध से बचने के लिएभी करते हैं।

हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल के बेटे दूसरी शादी के लिए चांद मियां बन गये थे और वापस पुनः विश्नोई बन गये ।हालांकि ऐसी घटनाएं कुछेक ही हैं। कुछेक ख्याती नाम वालों या सेलिब्रिटीज मुस्लिम लोगों का हिन्दू महिलाओं के साथ प्रेम विवाह हुआ है और मुस्लिम लोगों ने कभी कभी दिखाने के लिए या अपने मजहब से टकराव बचाने के लिए उनके निकाह में नाम भी बदले हैं। परंतु वास्तव में इन महिलाओं ने कोई धर्म परिवर्तन नहीं किया। शर्मिला टैगोर या करीना कपूर अभी भी इन्हीं नामों से याने हिन्दू के रूप में ही जानी जातीं हैं। आमिर खान और शाहरुख खान की पत्नियों केतो नाम भी नहीं बदले और वे साथ साथ हैं।

शादी दो व्यक्तियों के बीच होती है, न कि धर्मों के बीच। अकबर जोधाबाई, बाजबहादुर रूपमती के विवाह में कोई धर्म परिवर्तन नहीं हुआ था बल्कि दोनों अपने अपने धर्म को मानते रहे। यह कट्टरता पिछले तीन चार दशकों से ज्यादा बढ़ी है हालांकि मुस्लिम भाइयों को भी इसमें प्रगतिशील रूख अपनाना चाहिए। शादी के लिये धर्म परिवर्तन यह कोई मजहब नहीं, बल्कि उस जमाने की परिपाटियां थीं। मैंने अपने कई मुस्लिम मित्रों से और इमाम साहेबान से भी चर्चा की परंतु वे सहमत होते हुए भी अपने धर्म समूह के सामने खड़ा होने का साहस नहीं करते। मैंने उनसे अकबर जोधाबाई का उदाहरण देकर पूछा कि इसे मुस्लिम समाज ने कैसे स्वीकार किया, अगर यह अधार्मिक था। वे बोले – राजा नवाबों का कोई क्या बिगाड़ सकता है। मैंने उनसे पूछा कि क्या दो इस्लाम हैं? एक राजा महाराजाके लिये और एक सामान्य आदमी के लिए। तो वे चुप हो गये।
आमतौर पर सामान्य व्यक्ति अपने समाज या धर्म समूह के खिलाफउसकी ,कट्टरता के खिलाफ, अतार्किक स्थापनाओं के खिलाफ खड़ा होने का साहस नहीं जुटा पाता। अगर देश में ऐसे धार्मिक प्रतिबंध हटा दिए जाएं तो हिन्दू या मुसलमान के बीच बगैर धर्म परिवर्तन के शादियां हों सकेंगी। तो न केवल लव जिहाद जैसे विभाजक मुद्दे समाप्त होंगे बल्कि साम्प्रदायिकताभी कुछ कम हो सकती है ।और एक उदार प्र्गती शील समाज बन सकता है और सही मायने में हम एक मजबूत राष्ट्र बन सकते हैं ।परंतु यह दुर्भाग्य है कि धार्मिक समूहों के बीच यहाँ तक कि जातीय समूह के बीच इतनी मानसिक कठोर रेखाएं खींची गईं हैं कि इंसान पीछे और जाति-मजहब आगे हो जाता है। अभी भी वक्त है कि मुस्लिम भाई भी इन सवालों पर खुले मन से विचार करें और मजहबी कट्टरताओं से मुक्ति पाएं वरना वे भाजपा की खिलाफत तो करते रहेंगे परंतु भाजपा को मजबूत भी करते रहेंगे।
इस लव जिहाद के कानून से कुछ नैतिक समस्यायें भी पैदा हो सकती हैं। क्या दण्ड के भय से हिंदू मुस्लिम युवा प्रेम करने से डरकर प्रेम नहीं करेंगे और या फिर उनमे सम्बन्ध बनेंगे पर वे छिपे तथा अनैतिक रहेंगे।मेरी राय में इस्लाम के उदयकाल मे बहूविवाह को इसीलिए अनुमती दी गई थी कि व्यभिचार न हो। अब इसी आधार पर यह उचित होगा कि धर्म गुरु निर्णय करें और विवाह को एक धर्म की सीमाओं केबंधन से मुक्त करें।
22/11/2020 रघु ठाकुर

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