Friday, January 22, 2021
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‘स्टैच्यू ऑफ पीस’ का अनावरण, पीएम बोले- मार्गदर्शन के लिए भारत की ओर देख रही दुनिया

जयपुर : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज जैन भिक्षु आचार्य विजय वल्लभ सुरीश्वर जी महाराज की 151वीं जयंती समारोह के अवसर पर राजस्थान के पाली जिले में स्थापित उनकी 151 इंच ऊंची प्रतिमा का अनावरण किया. यह कार्यक्रम वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से आयोजित किया जा रहा है. पीएम मोदी इस मौके पर संबोधित किया.

अपने संबोधन के दौरान पीएम मोदी ने कहा कि मेरा सौभाग्य है कि मुझे देश ने सरदार वल्लभ भाई पटेल की विश्व की सबसे ऊंची स्टेचू ऑफ यूनिटी के लोकार्पण का अवसर दिया था और आज जैनाचार्य विजय वल्लभ जी की भी स्टेचू ऑफ पीस के अनावरण का सौभाग्य मुझे मिल रहा है.

पीएम ने कहा कि भारत ने हमेशा पूरे विश्व को, मानवता को, शांति, अहिंसा और बंधुत्व का मार्ग दिखाया है. ये वो संदेश हैं जिनकी प्रेरणा विश्व को भारत से मिलती है. इसी मार्गदर्शन के लिए दुनिया आज एक बार फिर भारत की ओर देख रही है.

भारत का इतिहास आप देखें तो आप महसूस करेंगे, जब भी भारत को आंतरिक प्रकाश की जरूरत हुई है, संत परंपरा से कोई न कोई सूर्य उदय हुआ है. कोई न कोई बड़ा संत हर कालखंड में हमारे देश में रहा है, जिसने उस कालखंड को देखते हुए समाज को दिशा दी है. आचार्य विजय वल्लभ जी ऐसे ही संत थे.

उन्होंने कहा कि एक तरह से आचार्य विजयवल्लभ जी ने शिक्षा के क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाने का अभियान शुरू किया था. उन्होंने पंजाब, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र उत्तर प्रदेश जैसे कई राज्यों में भारतीय संस्कारों वाले बहुत से शिक्षण संस्थाओं की आधारशिला रखी.

बता दें कि अष्टधातु से बनी यह मूर्ति पाली जिले के जैतपुरा में स्थित विजय वल्लभ साधाना केन्द्र में स्थापित की गई है. 151 इंच ( 13 फीट) की अष्ट धातु से बनी मूर्ति जमीन से 27 फिट ऊंची है. इसका वजन करीब 1300 किलो है, जिसे ‘स्टेच्यू ऑफ पीस’ (Statue Of Peace) नाम दिया गया है.

जानकारी के अनुसार जैन भिक्षु आचार्य विजय वल्लभ सूरीश्वरजी (1870-1954) का जन्म गुजरात के बड़ोदा में विक्रम संवत 1870 में हुआ था. वे खादी स्वदेशी आंदोलन के पैरोकार रहे हैं. बताया जाता है जब 1947 में भारत-पाकिस्तान का विभाजन हुआ था, तब वे पाकिस्तान के गुजरांवाला में चातुर्मास कर रहे थे, तब ब्रिटिश सरकार ने उनको लाने के लिए विशेष विमान भेजा था. लेकिन सितंबर 1947 को वे अपने 250 अनुयायियों के साथ पैदल ही भारत पहुंचे थे.

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