Saturday, January 16, 2021
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उप चुनाव में सिर्फ दो दलों ही नही एक नेता और एक शाही प्रासाद का भविष्य भी होगा तय

@देव श्रीमाली-.

उप चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। कुछ दिनों बाद नामांकन भरने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी । वैसे यह चुनाव मप्र ही नही देश मे भी सबसे अलग भी और संभवतः पहली दफा भी । इसकी दो बजह है । एक तो देश मे पहला मौका है जब किसी राज्य में एक साथ दस फीसदी से ज्यादा सीटों पर उप चुनाव हो रहे हों । प्रदेश में कुल 230 विधानसभा सीटों में से 28 पर उप चुनाव होना है । दूसरी खास बात ये कि, इनमे से 95 फीसदी पर सत्तारूढ भाजपा के वे प्रत्याशी है जिन्होंने बतौर कांग्रेस उम्मीदवार 2019 के आम चुनाव में भाजपा दिग्गजो को धूल चटाई थी । ….और इससे भी अलग तीसरी बड़ी और अलग बात है कि इस चुनाव में फैसला भोपाल की सरकार के भाग्य का होना   है लेकिन  फैसला ग्वालियर चम्बल अंचल की  जनता को करना है ।  एक और खास बात यह कि  इस चुनाव में सिर्फ मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सरकार की ज़िंदगी और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ की फिर से सत्ता पर काबिज होने की उम्मीदों का फैसला होना लेकिन ग्वालियर चम्बल अंचल में सियासत में ये बड़े मुद्दा नहीं है । यहां की सियासी आबोहबा में बड़ा मुद्दा कुछ और ही है । और यह है जयविलास पैलेस की राजनीतिक ज़िंदगी का । 
प्रदेश में जो 28 विधानसभा सीटों के उप चुनाव होना है उनमें से सबसे अधिक या यूं कहें कि निर्णायक ग्वालियर चम्बल अंचल में होना है । पूरे सोलह । प्रदेश से इतर पूरा अंचल चुनाव की जद में है । सिर्फ श्योपुर को छोड़कर कोई जिला ऐसा नही है जहां की किसी न किसी सीट पर उप चुनाव न हो ।
मप्र ,यूपी और राजस्थान से घिरे और बीहड़ों के आभूषण और रेत और पत्थर की जानलेवा तस्करी को लेकर चर्चित मुरैना जिले में 2019 में भाजपा का सूफड़ा साफ हो गया था ।  छह में से छह सीटें कांग्रेस ने जीतकर भाजपा की शिवराज सिंह सरकार का तीसरी बार सरकार बनाने निकले अश्वमेघ के अश्व को रोक लिया था । अब इनमे से पांच पर उप चुनाव है । चार विधायको ने सरकार गिराने के लिए कांग्रेस की सरकार गिराई थी । ये सब अब भाजपा प्रत्याशी है और एदल सिंह कंसाना और गिर्राज दंडोतिया मंत्री भी । जौरा में विधायक बनवारी लाल शर्मा के निधन से सीट रिक्त हुई थी ।
इस जिले से भाजपा उम्मीदवार तय है । सुमावली से
एदल सिंह कंसाना दिमनी से गिर्राज दंडोतिया अम्बाह से कमलेश जाटव और मुरैना से रघुराज कंसाना का नाम तय है और जौरा से अभी भाजपा और सिंधिया के बीच रस्साकसी चल रही है । कहते है सिंधिया का दावा इस सीट पर है क्योंकि दिवंगत विधायक उनके थे जबकि भाजपा चाहती है कि कम से कम एक सीट तो अपने कैडर को सौंपे ।
सदैव से चौंकाने वाले परिणाम देने वाले इस जिले में कांग्रेस आंचलिक नेताओं के भरोसे है जबकि भाजपा के पास केंद्रीय मंत्री नरेंद्र तोमर और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बी डी शर्मा की प्रतिष्ठा भी दांव पर है । भाजपा के मूल कार्यकर्ताओं से सिंधिया समर्थको से तादात्म्य बनाना भाजपा के लिए कड़ी चुनौती भी है और फैसला भी इसी पर होना है । बीते दो दशक से इस जिले में हाथी सीटी बोलकर किसी का भी खेल  बिगाड़ता रहा है सो उसकी मदमस्त चाल की गति का आकलन करना भाजपा के लिए भी चुनौती है और कांग्रेस के लिए भी । यानी सावधानी हटी दुर्घटना घटी।
मुरैना के बाद उप चुनाव के बाद सबसे बड़ा अखाड़ा है – ग्वालियर । इस जिले की आधी यानी छह में से तीन पर उप चुनाव हो रहे है । तीनो खालिस सिंधिया के खास ,इनमे से दो कमलनाथ से शुरू होकर शिवराज सिंह की काबीना के मंत्री । डबरा सुरक्षित से भाजपा को तीन बार धूल चटाने वाली इमरती देवी अब भाजपा के भरोसे ही है । यह क्षेत्र इमरती नही भाजपा के कद्दावर नेता डॉ नरोत्तम मिश्रा के नाम से जाना जाता है लेकिन अब अब भाजपा में सत्ता का दूसरा पॉवर पॉइंट बनने का भी चुनाव होना ।
ग्वालियर सीट कभी वर्तमान केंद्रीय मंत्री नरेंद्र तोमर की थी । उन्होंने अपनी सियासत का ककहरा इसी सीट से सीखा । वे राष्ट्रीय राजनीति में गए तो ‘महल” और “सिंधिया”के खिलाफ फ्रंट लाइन की राजनीति संभाली जयभान सिंह पवैया ने । उन्होंने जब पहली दफा लोकसभा का चुनाव लड़ा तब माधव राव सिंधिया का सितारा बुलंदी पर था । लेकिन परिणामो ले जरिये पवैया ने न केवल सबको चौंकाया बल्कि सिंधिया को डरा भी दिया । पवैया हारे तो मगर, महज साढ़े छब्बीस हजार से । उसमे भी ग्वालियर विधानसभा क्षेत्र में उन्होंने बहुत बड़ी बढ़त ली । इसके बाद माधव राव सिंधिया ने फिर कभी ग्वालियर से चुनाव नहीं लड़ा । फिर पवैया लोकसभा सदस्य भी बने ।  पवैया ने ग्वालियर विधानसभा को सिंधिया विरोध की अपनी प्रयोगशाला बना लिया । वे पहला विधानसभा चुनाव हार गए लेकिन दूसरा जीत गए । शिवराज सरकार में मंत्री भी रहे लेकिन सिंधिया समर्थक प्रद्युम्न सिंह तोमर ने 2019 में उन्हें हरा दिया । अब हालात एकदम उलट है । सिंधिया समर्थक श्री तोमर अब भाजपा उम्मीदवार है और पवैया को उन्हें जिताने के जतन करना है ।
यहाँ से कमलनाथ ने कांटे से कांटा निकालने की रणनीति अपनाई । शुरुआती दौर से सिंधिया के कट्टर समर्थक रहे सुनील शर्मा को कांग्रेस ने प्रत्याशी बनाया है । यहां सिंधिया समर्थक भाजपा और सिंधिया समर्थक कांग्रेस के बीच मुकाबला होना है । पवैया और सिंधिया का एक साथ एक ही व्यक्ति के लिए वोट मांगते देखना बड़ा नज़ारा होगा, जिसका सबको इंतजार भी है और यही परिणाम भी तय करेगा ।
ग्वालियर पूर्व पर बड़ा ही मजेदार चुनाव होना है । यहाँ वही उम्मीदवार मैदान में है जो 2019 में आमने- सामने थे । बदले है तो सिर्फ दल । पिछला चुनाव जीते मुन्नालाल गोयल अब भाजपा प्रत्याशी है जबकि उनसे करारी मात खाने वाले तब भाजपा उम्मीदवार रहे सतीश सिकरवार अब कांग्रेस के हाथ के लिए वोट मांग रहे है । इस क्षेत्र में सिकरवार का मजबूत आधार है । तीन वार्डो पर उनका दो दशक से कब्जा है जबकि गोयल की पकड़ सजातीय व्यापारी वोटर्स पर पक्की है । सिंधिया का जयविलास पैलेस भी इसी क्षेत्र में आता है । लिहाजा यज़ सीट पर सिंधिया की प्रतिष्ठा सर्वाधिक दांव पर रहेगी।
चम्बल के दूसरे जिले भिंड में दो सीटों पर उप चुनाव हो रहे हैं । इनमे से एक गोहद दलित सीट है जहां से पिछली दफा काँग्रेस के रणवीर जाटव ने भाजपा के दिग्गज नेता और तब के  मंत्री लाल सिंह आर्य को बड़े अंतर से हरा दिया था । अब रणवीर कांग्रेस की जगह भाजपा प्रत्याशी है जबकि जिताने का जिम्मा उनके प्रतिद्वंद्वी रहे श्री आर्य पर है । यही चुनौती भी है और उनकी राह आसान करने की जड़ी बूटी भी । श्री आर्य को भाजपा ने विगत दिनों ही भाजपा की अनुसूचित जाति मोर्चा का राष्ट्रीय अध्यक्ष जैसा महत्वपूर्ण पद सौंपा है । 
भिंड जिले की दूसरी सीट मेहगांव है । यहां से पिछला चुनाव कांग्रेस टिकिट पर जीते ओपीएस भदौरिया ने सरकार गिराने के लिए विधायक पद से  इस्तीफा दिया था  । बदले में सिंधिया ने उन्हें भाजपा टिकिट तो दिलाया ही इनाम में राज्यमंत्री भी बनवाया । इस क्षेत्र से अब्बल तो मंत्री बनने वाले वे पहले नेता है और क्षत्रिय नेता के रूप में भी वे पहले मंत्री बने है सो सजातीय वोट उनके साथ है लेकिन भाजपा नेताओं से एकाकार न हो पाना कड़ी चुनौती है लेकिन इससे भी बड़ी चुनौतियां कोंग्रेस की है । यहाँ से राकेश चौधरी टिकिट चाहते है जिन्होंने पिछला चुनाव भिंड से भाजपा टिकिट पर लड़ा था । हारे भी थे । उनके खिलाफ दिग्विजय सिंह,अजय सिंह और राहुल भैया और डॉ गोविंद सिंह खुलकर है जबकि सुरेश पचौरी उनकी पैरोकारी कर रहे है । कमलनाथ यहाँ जातिगत नट रस्सी साधना चाहते है । वे क्षत्रीय के मुकाबले ब्राह्मण का चम्बल फॉर्मूला लेकर बैठे है । राकेश चौधरी का नाम भी इसी बजह से है । उनके अलावा स्व सत्यदेव कटारे के पूर्व विधायक बेटे हेमन्त कटारे और पूर्व सहकारिता मंत्री डॉ गोविंद सिंह के समर्थक ब्रजकिशोर शर्मा कल्लू का नाम भी है ।
यहां से बसपा ने ओबीसी कार्ड खेल दिया है । उसने लोधी प्रत्यासी को पहले ही उतारकर साफ कर दिया है कि मुकाबला त्रिकोणीय ही होगा।
भाजपा के कद्दावर नेता नरोत्तम मिश्रा के जिले दतिया में भांडेर सीट पर उप चुनाव होना है । यहां से भाजपा प्रत्याशी रक्षा सिरोनिया है जिन्होंने मिश्रा की उम्मीदवार रजनी प्रजापति को हराया था अब स्वयम मिश्रा पर रक्षा को जिताने का जिम्मा है । यहां से पूर्व भाजपा विधायक घनश्याम पिरोनिया की नाराजगी दिक्कत पैदा कर रही है । तो बसपा बैक ग्राउंड वाले फूल सिंह बरैया को कांग्रेस का टिकिट देकर कांग्रेस की प्याली में भी तूफान लाकर रखा है । दिग्गज नेता पूर्व मंत्री महेंद्र बौद्ध बसपा का हाथ थाम चुके है । लेकिन यहां मुकाबला रोचक होगा जिसमें डॉ मिश्रा की प्रतिष्ठा भी दांव पर रहेगी।
सिंधिया परिवार के प्रभाव वाले शिवपुरी जिले की दो सीटों पर उप चुनाव होना है । करैरा सुरक्षित और पोहरी । यह दोनों सीटे 2019 में ज्योतिरादित्य समर्थको ने जीती थी लेकिन अब दोनों भाजपा प्रत्याशी है । पोहरी से सुरेश राठखेडा किरार जाति के है । सिंधिया ने उन्हें राज्यमंत्री भी बनवाया है । उनके मुकाबले कमलनाथ ने सिंधिया के कट्टर विरोधी हरिबल्लभ शुक्ला को मैदान में उतारकर संकेत दिए कांग्रेस सिर्फ भाजपा से ही नही जयविलास से भी लड़ाई लड़ रही है। इस सीट पर बसपा का बड़ा जनाधार है सो मुकाबला त्रिकोणीय होगा । करेरा से भाजपा की उम्मीदवारी जसवंत जाटव के लिए तय है जबकि कांग्रेस यहां से प्रागीलाल को बसपा से लेकर आई है । वे दो चुनाव से बसपा प्रत्याशी के रूप में जोरदार टक्कर देते रहे। जीते भले ही नही लेकिन उन्होंने मजबूत जमीनी आधार बना लिया । कांग्रेस उसी नाव पर सवार होकर चुनावी वैतरणी पार करने की ख्वाहिश में है ।
गुना के बम्होरी में पिछला चुनाव कांग्रेस से  जीतने वाले महेंद्र सिंह सिसोदिया अब भाजपा प्रत्याशी है जबकि कभी भाजपा से उन्हें हराने वाले पूर्व मंत्री केएल अग्रवाल को कांग्रेस ने उनके मुकाबले खडा करके चुनाव को रोचक ही नही चुनौतीभरा भी बना दिया है । इस सीट पर सिंधिया और दिग्विजय सिंह दोनो आमने – सामने होंगे । दोनो की प्रतिष्ठा यहाँ सीधे टकराएगी । गुना दिग्विजय सिंह का जिला है जबकि भाजपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ रहे महेंद्र सिंह सिसोदिया, सिंधिया के खास है ।
अशोक नगर और मुंगावली में मुकाबला प्रत्याशियों में नही सिंधिया से होगा । यहां मिली करारी पराजय से आहत हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया की  पूरी राजनीति ही बदल गई । मुंगावली में कांग्रेस ने लोधी को उतारकर बड़ा जातीय गणित फैंका है । अब सिंधिया से छिटके यादव वोटों का फिर से अपने पक्ष में ध्रुविकरण करने की चुनौती सिंधिया के लिए भी है और भाजपा के लिए भी ।
यानी अंचल की सोलह सीटों के चुनाव परिणाम सिर्फ सरकारें बनाने बचाने ले ही नही बल्कि इससे भी बड़े और दीर्घकाल तक प्रभावित करने वाले संकेत भी देंगे । सबसे बड़ा संकेत मिलेगा भाजपा में नेताओं का क्रम बदलेगा या नही? और यह तय करेगा कि जयविलास पैलेस की ताकत का नए सिरे से आकलन कैसे होगा ? 1972 के बाद  पहली बार है जब पूरा सिंधिया परिवार सिर्फ और सिर्फ एक दल के साथ है । वह भी भाजपा के साथ । 1977 के बाद से राजमाता विजयाराजे सिंधिया भाजपा के साथ रही तो उनके बेटे माधव राव सिंधिया जीवन पर्यंत कांग्रेस में रहे । इसके बाद भी ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस में तो उनकी बुआ यशोधरा राजे भाजपा के साथ रही । अब जयविलास प्रासाद के किसी भी दरवाजे से कांग्रेस के झंडे लगी गाड़ी नही जाती।

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