Wednesday, January 20, 2021
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ग्वालियर की गोशाला में शुरू हुआ गोसंवर्धन, तैयार होगी थारपारकर नस्ल

ग्वालियर

रानीघाटी गोशाला में ज्यादा दूध देने वालीं देसी गायों की नस्लांे को तैयार किया जाएगा। इसमें थारपारकर, काकरेच, हरियाणवी, गिर, मालवीय नस्ल शामिल हैं। रानीघाटी गोशाला में दो थारपारकर नस्ल के नंदी आ चुके हैं। साथ ही तीन हरियाणवी नस्ल के नंदी भी लाए गए हैं। जबकि स्थानीय मालवीय नस्ल के कुछ बेहतर नंदी भी गोशाला में लाए जा चुके हैं।

भारत में पाई जाने वाली करीब 43 प्रकार की देसी गाय हैं। इनमें गिर, काकरेच, रेड सिंधी, थारपारकर, हरियाणवी, साहीवाल, मालवीय, निवाड़ी, जवरी, हल्लीकार, औंगोल, कांगायाम, अंब्लाचेरी, बारगूर, कारसगौड़, देवनी, लाल कंधारी, गावलव, सिंधी, कृष्णा आदि नस्ल की देसी गाय पाई जाती हैं।

स्थापना के साथ ही आत्मनिर्भर हो चुकी है रानीघाटी गोशाला में गोसंवर्धन का काम भी शुरू हो गया है। गायों की नस्ल को सुधारकर ज्यादा दूध देने वाली थारपारकर नस्ल को विकसित किया जाएगा। इस नस्ल की उत्पत्ति पाकिस्तान के सिंध प्रांत के थारपारकर जिले की मानी जाती है। भारत में राजस्थान के जोधपुर, गुजरात के कच्छ जिलों में यह पाई जाती है। यह गाय दिन में 8 से 10 लीटर दूध देती है। नस्ल सुधार के लिए गोशाला में इस नस्ल के नंदी आ चुके हैं।

रानीघाटी गोशाला का निर्माण जिला पंचायत द्वारा किया गया है। गोशाला के शुरू होते ही यहां पर गायों की देखभाल कर रहे श्रीकृष्णायन देसी गोरक्षाशाला के संतों ने गोसंवर्धन का कार्य शुरू कर दिया है। क्योंकि गोशाला में लाई जा रहीं अधिकांश गायों को ग्रामीणों ने विदेशी नस्ल से क्रॉस कराकर उनकी नस्ल खराब कर दी थी। नस्ल खराब होने के कारण गायों के दूध देने की क्षमता भी प्रभावित हुई है। पहले जो गाय 8 से 10 माह तक दूध देती थी वह घटकर 4 से 6 माह दूध देने वाली रह गई है। साथ ही दूध का उत्पादन भी घटकर प्रति गाय से 1 से 2 लीटर रह गया है।

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