Thursday, January 21, 2021
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गहलोत की विशेष सत्र बुलाने की मांग पर राज्यपाल ने कहा- आपके पास बहुमत है तो फिर सत्र की क्या जरूरत; 6 आपत्तियां बताईं

कांग्रेस सरकार की ओर से निशाने पर लिए जाने के बाद राजभवन ने भी सख्त रुख अपना लिया। राज्यपाल कलराज मिश्र ने कहा है कि संवैधानिक मर्यादा से ऊपर कोई नहीं होता। किसी भी तरह के दबाव की राजनीति नहीं होनी चाहिए। जब सरकार के पास बहुमत है तो सत्र बुलाने की क्या जरूरत है?

सरकार ने 23 जुलाई को रात में बहुत कम समय में नोटिस के साथ सत्र बुलाने की मांग की। कानून के जानकारों से इसकी जांच करवाई गई तो 6 पॉइंट्स में कमियां पाई गईं। इसे लेकर राजभवन ने पूरा नोट जारी किया है।

सत्र बुलाने पर 6 आपत्तियां

  • सत्र किस तारीख से बुलाना है, इसका ना कैबिनेट नोट में जिक्र था, ना ही कैबिनेट ने अनुमोदन किया।
  • अल्प सूचना पर सत्र बुलाने का ना तो कोई औचित्य बताया, ना ही एजेंडा। सामान्य प्रक्रिया में सत्र बुलाने के लिए 21 दिन का नोटिस देना जरूरी होता है।
  • सरकार को यह भी तय करने के निर्देश दिए हैं कि सभी विधायकों की स्वतंत्रता और उनकी स्वतंत्र आवाजाही भी तय की जाए।
  • कुछ विधायकों की सदस्यता का मामला हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में है। इस बारे में भी सरकार को नोटिस लेने के निर्देश दिए हैं। कोरोना को देखते हुए सत्र कैसे बुलाना है, इसकी भी डिटेल देने को कहा है।
  • हर काम के लिए संवैधानिक मर्यादा और नियम-प्रावधानों के मुताबिक ही कार्यवाही हो।
  • सरकार के पास बहुमत है तो विश्वास मत के लिए सत्र बुलाने का क्या मतलब है?

70 साल में पहली बार किसी राज्यपाल ने कैबिनेट की सलाह नहीं मानी
राजस्थान में कैबिनेट की सलाह के बावजूद राज्यपाल कलराज मिश्र विधानसभा का सत्र नहीं बुला रहे। संविधान के एक्सपर्ट पीडीटी आचारी के मुताबिक कैबिनेट की सिफारिश के बाद राज्यपाल को सत्र बुलाना ही होता है। संविधान के मुताबिक एक बार इनकार के बाद अगर कैबिनेट सत्र बुलाने की दोबारा मांग करती है तो, राज्यपाल को मानना पड़ता है। संविधान लागू होने के बाद 70 साल में पहली बार किसी राज्यपाल ने कैबिनेट की सलाह नहीं मानकर सत्र बुलाने से इनकार किया है।

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