Sunday, October 25, 2020
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सरकार के निशाने पर मध्यवर्ग

विश्वव्यापी कोरोना संकट की आड़ में देश की अर्थव्यवस्था को समाह्लने में नाकाम रही देश की सरकार निम्न वर्ग का कचूमर निकलने के बाद अब मध्यवर्ग को निशाने पर ले चुकी है .निम्न वर्ग तो सड़कों पर भूख-प्यास से जूझते हुए भी सरकार के खिलाफ संगठित नहीं हो पाया है लेकिन मध्यवर्ग इस तरह की कोई कोशिश न कर बैठे इसलिए अब उसकी कमर तोड़ने का अभियान शुरू हो गया है .जैसे-जैसे देश लाकडाउन से बाहर आ रहा है ,वैसे-वैसे मध्यवर्ग की मुश्कें बाँधने का इंतजाम कर लिया है .पिछले दिनों २० लाख करोड़ के पॅकेज में मध्यवर्ग के लिए सरकार ने कोई महत्वपूर्ण योजना नहीं बनाई ,क्योंकि उसे पता है की ये ही एक ऐसा वर्ग है जो पूरे दो माह घर में चुपचाप बैठकर खाने-पीने की नई रेसिपी बनाने में उलझा रहा .ये वर्ग न कतारों में लगा और न इसने घर वापसी के लिए रेल,बस की मांग की .पैदल चलने का तो सवाल ही नहीं .इसी वर्ग की जेबें कतरने के लिए सरकार ने पहले तो सरकारी नौकरियों में लगे लोगों की जेबें काटीं अब गैर सरकारी नौकरियों में काम करने वालों की जेबों पर धावा बोला जा रहा है
देश को ६८ फीसदी जनसंख्या गांवों में और बाकी की शहरों में रहती है .ग्रामीण भारत को तो कोरोना ने दिन में ही तारे दिखा दिए हैं लेकिन अब बारी उस तीस फीसदी शहरी आबादी की है जो अपने गांवों से काट चुकी है और भाग कर कहीं नहीं जा सकती .इस आबादी में वे १० करोड़ बूढ़े भी हैं जिनका जीवन या तो सरकारी पेंशन पर कट्टा है या फिर परिवार के रहमो करम पर .आपको मालूम ही होगा की भारत का माध्यम वर्ग हमेशा से अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार रहा है इसलिए देश की अर्थव्यवस्था का निर्धारण भी इस माध्यम वर्ग को देखकर किया जाता है .माध्यम वर्ग की वार्षिक आय ३.१४ लाख सालाना से लकर १७ लाख सालाना तक हो सकती है .
आंकड़े बताते हैं की भारत सरकार ने अब इसी माध्यम वर्ग का दोहन करने के हिसाब से अपनी नीतियों का निर्धारण किया है. अब रेलें चलें या हवाई जहाज लूटेगा मध्यम वर्ग ही .जो कुछ क्रय शक्ति बची है इसी माध्यम वर्ग के पास है ,यही वर्ग भविष्य में सरकार के लिए परेशानी का सबब बन सकता है .ये उत्पादक नहीं बल्कि उपभोक्ता वर्ग है. इसकी न कोई जड़ है और न जमीन.ये भागकर कहीं नहीं जा सकता .ये वर्ग गांवों से अपनी जड़ें काटा चुका है और शहर ने इसे दड़बों में कैद कर दिया है .इसे हर सेवा की कीमत देना पड़ती है. इसके पास न हवा है,न पानी और न रौशनी .
दुनिया के लिए भारत का यही माध्यम वर्ग सबसे बड़ा बाजार है.कोरोना स्नाक्त ने इस बाजार को एक नयी शक्ल दे दी है .भारत की 60 फीसदी आबादी भले ही सेनेटाइजर न खरीदे,मास्क न खरीदे लेकिन ये वर्ग इसके लिए हाजिर है .जीवन रक्षा के लिए यही वर्ग है जो लूटने के लिए सदा तैयार रहता है. एक तरह से माध्यम वर्ग भेद है जिसे सरकार कभी भी मूंड सकती है ,क्योंकि ये वर्ग आत्म निर्भर नहीं है.इसे घर की सफाई से लेकर वर्तन ,कपड़े धोने,प्रेस करने और अन्य ऐसे ही हर काम के लिए सेवकों की जरूरत होती है .
पूरे 60 दिन घरों में कैद रहा ये माध्यम वर्ग जैसे ही बाजार मेमन उतरेगा अर्थव्यवस्था हरी-भरी होती दिखाई देने लगेगी लेकिन वास्तव में होगी नहीं .यही कारण है की जिस हड़बड़ी में देश में लाकडाउन कर निम्न आय वर्ग की ऐसी-तैसी की गयी थी ठीक वैसी ही दुर्दशा लाकडाउन को हड़बड़ी में हटाकर माध्यम वर्ग की होने वाली है .आप सोचते होंगे की सरकार ये सब किसी दबाब में कर रही है लेकिन हकीकत ये नहीं है,ये सब एक सोची-समझी रणनीतिका हिस्सा है .सरकार ने जिस तरह से दो माह तक कथित सोशल डिस्टेंस का पालन करने पर जोर दिया था ,अब वही सरकार इस सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़वा रही है ,क्योंकि सरकार के पास इसका कोई विकल्प ही नहीं है,संसाधन तो हैं ही नहीं .इसलिए जब दूरी घटेगी तो बीमारी बढ़ेगी और जब बीमारी बढ़ेगी तो बाजार लूटपाट के लिए तैयार खड़ा मिलेगा .
बहरहाल सरकार अपनी चाल चल रही है,जनता को भी इसका मुकाबला करने की तैयारी करना चाहिए,क्योंकि विखंडित विपक्ष तो आपकी मदद करने से रहा और संगठित सत्तापक्ष आपको लूटने के लिए कमर कसकर तैयार है ही .ये वो दौर है जब मीडिया हथियार डाल रहा है .जान का भय दिखाकर दो महीने निकलने वाली सरकार अब दुसरे मुद्दों की तरफ जनता का ध्यान बांटने में लगी है .फिर से मंदिर सामने है ,महंगाई सुरसा बनकर सामने है ही .
पिछले दो महीने से खाली बैठा बाजार जनता को लूटने के लिए उत्सुक है ,सरकार उसके साथ है,केवल जनता अनाथ है .इस अनाथ जनता के हाथ में ही सब कुछ है और कुछ भी नहीं .ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जो इन दो महीनों में कराहा न हो लेकिन सबका उपचार नहीं किया गया .मुश्किल ये है की सरकार अब उपचार करेगी या सियासत ,क्योंकि उसके लिए सियासत भी जरूरी है और दुसरे काम भी .
@ राकेश अचल

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