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दांव पर लगी है सिंधिया ,शिवराज ,दिग्विजय सिंह  और कमलनाथ की नाक

दांव पर लगी है सिंधिया ,शिवराज ,दिग्विजय सिंह  और कमलनाथ की नाक

कसमें  वादे प्यार वफ़ा सब 

बातें हैं बातों का  क्या ।

 

मुरैना जिले में  यहां  की  5 विधानसभा सीटों पर होने बाले उप चुनाव में जीत दर्ज कराना पार्टियों से ज्यादा शिवराज सिंह ,दिग्विजय सिंह , कमलनाथ और सिंधिया की नाक का सबाल बन गया  है ।सुमावली हराना दिग्विजय और सिंधिया दोनों की तो जौरा जितना शिवराज सिंह की मुरैना जीतना  सिंधिया की  नाक का सबाल बन गया है वही सभी 5 सीटें  जीतना कमलनाथ की नाक का सबाल  बन गया है अब इतनी  बड़ी बड़ी नाकें  दांव पर लगी हों तो यह सोचना बनता है कि चुनाव में होगा क्या  ?जिला मुख्यालय की सीट होने के कारण ज्यादातर विमर्श मुरैना सीट के लिए ही होकर रह जाता है जब कि कांग्रेस हो या भाजपा दोनो को यहां की सभी 5 सीटें जीतना जरूरी  है ।इन पर  जीत अब प्रतिष्ठा से भी जुड़ गई है विशेषतः ज्योतिरादिय सिंधिया की प्रतिष्ठा इन सीटों पर ज्यादा दांव पर लगी है ।

 

यह भी दिलचस्प है कि म प्र में  इतनी सीटे एक साथ और किसी जिले में खाली नही हुई हैं यह ज्योतिरादित्य सिंधिया की लोकप्रियता का नतीजा था उन्हें मुख्यमंत्री बनाने के लिए यहां के लोगों ने कांग्रेस को भर भर कर वोट दिए थे जिसके चलते पहली बार जिले की सभी 6 सीटें कांग्रेस जीत पाई थी  लेकिन न कांग्रेस न सिंधिया और न उनके जीते विधायक जनता के मनोभाव को समझ सके अब एक बार फिर गेंद जनता के हाथ में है लेकिन क्या इस बार वह भाजपाई हुए सिंधिया और उनके विधायको पर फिर से उतना प्यार लुटाएगी ? जबाब भी साफ है “बिल्कुल नही ” 5 में से एक दो को छोड़ कर कोई भी सीट जीतना सिंधिया खेमे के  लिए आसान नही होगा तो फिर कांग्रेस जीतेगी ? यह निर्भर करेगा उसके प्रत्याशियों पर उसके साथ एक  प्लस पॉइंट है भाजपाइयों की भितरघात का । पार्टी कितना ही एकता एकजुटता का दावा करे हकीकत में अंदर से उसे भी एहसास है कि चुनाव में क्या होने जा रहा है ।

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प्रत्याशी की बात करें तो कांग्रेस की हालत पतली दिखाई देती है जबकि भाजपा कांग्रेस से आये ताजे ताजे भाजपाइयों के चलते ओवर ईटिंग की शिकार है उसे उल्टी दस्त हो रहे हैं वह इन जबरदस्ती के मेहमानों से पीछा छुड़ाना चाहती है जिला नही तो विधानसभा क्षेत्र में तो यही स्थिति है ।-

—अम्बाह बिधान सभा क्षेत्र

कांग्रेस की जो ताजी सूची बाजार में हैं उसमें अम्बाह सुरक्षित सीट से सत्यप्रकाश सखबार का नाम सामने आया है अगर मेरी जानकारी सही है तो सत्यप्रकाश वही है जो पहले बसपा से यहां से विधायक चुने जा चुके है और उसके प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं अम्बाह  सुरक्षित सीट है उसके लिए कहा जाता है कि कोई भी सखबार जिस पर खर्चने को मोटी रकम हो अम्बाह से चुनाव जीतने की ताकत रखता है  लेकिन 2018 में नेहा किन्नर ने इस मिथक को तोड़ दिया निर्दलीय होते हुए भी वह भाजपा के गब्बर सखबार को तीसरे नम्बर पर फेकने  में सफल रही आज जिन सत्यप्रकाश सखबार की बात हो रही है 2018 में उन्होंने बसपा से चुनाव  लड़ा था और चौथे नम्बर पर रहे थे ।कमलेश जाटव अगर इस बार कांग्रेस की जगह भाजपा से मैदान में उतर रहे हैं तो निर्दलीय नेहा किन्नर को कांग्रेस क्यों नही अपना उम्मीदवार बनाती भाजपाइयों और कांग्रेसियों के सहयोग से नेहा की जीत पक्की होगी ।

–दिमनी विधान सभा क्षेत्र

दिमनी से 2018 में कांग्रेस से गिर्राज डंडोतिया जीते थे उन्होंने  भाजपा के शिवमंगल सिंह तोमर को हराया था नई परिस्थितियों में गिर्राज डंडोतिया शिवमंगल सिंह की पार्टी में हैं और उपचुनाव में शिवमंगल सिंह को गिर्राज डंडोतिया को जिताने के  लिए पसीना बहाना है जब कि उनमें प्रतिद्वदिता खून बहाने की है कांग्रेस से  अभी रविन्द्र सिंह तोमर का नाम चर्चा में है थे तो वे सिंधिया गुट में लेकिन उन्होंने कांग्रेस नही छोड़ी बल्कि महाराज को छोड़ दिया है उनके साथ सबसे बड़ा सबाल यही है कि क्या कांग्रेस उनका  भरोसा कर सकती है ? शायद नही ,उस स्थिति में कांग्रेस यहां किसी गैर सिंधिया उम्मीदवार की खोज में जुटी है इस खोज में एक नया नाम सामने आया है योगेंद्र सिंह तोमर का  ।बसपा के कमजोर रहने से फाइट सीधी सीधी फूल और पंजे में होगी ऐसे में कांग्रेस किसी पैसे बाले भाजपाई को भी  यहां से मौका दे सकती है ।यहां भितरघात बहुत जबरदस्त होगा जिसे सम्हालना गिर्राज डंडोतिया के लिए मुश्किल होगा सिंधिया का प्रभाव इस सीट पर बहुत कम रह है नही तो मुंशीलाल यहां से 5 बार विधायक नही चुन पाते ।

–सुमावली विधान सभा क्षेत्र

कांग्रेस के लिए सुमावली सिर्फ एदल सिंह कंसाना ही जीत पाए हैं वो भी दिग्विजय सिंह के खेमे में रह कर ।दिग्गी राजा के सहयोग से उन्होंने हमेशा सीधे सीधे सिंधिया की प्रभुता को चुनौती दी और चाह कर भी सिंधिया न उन्हें हराने की जुगत कर पाए न कभी उनका टिकट रोक पाए उनका प्रचार भी सिंधिया ने कभी नही किया जब कि मुरैना और सुमावली मिली जुली विधानसभा है  सिंधिया खेमे की कांग्रेस से बगावत की कहानी में एदल सिंह की कोई भूमिका नही थी उनकी अपनी अलग कहानी थी जो कहीं और किसी और के द्वारा लिखी गई थी ।अब अगर कोई यह उम्मीद कर रहा है कि सिंधिया  इस बार उनकी जीत चाहेंगे तो यह सोचने बाले की नादानी है सिन्धिया ही नही दिग्गी राजा के लिए उनको हराना नाक का सबाल बन चुका है  । इस तरह एदल सिंह को कई मोर्चों पर लड़ना है 2018 का चुनाव वे  भाजपा के अजब सिंह कुशवाह से 13313 वोटों से जीते थे यह  कोई बड़ी जीत नही थी ।कांग्रेस  के पास गैर सिंधिया खेमे के राकेश यादव ,जैसे कुछ नाम हैं एक मानवेन्द्र गांधी का नाम भी चर्चा में है 2018 में वे बसपा के प्रत्याशी थे उन्हें 31 हजार के आसपास वोट मिले थे उनके कांग्रेस में आने की सूचना भी किसी के पास नही है लेकिन उन्हें कांग्रेस का प्रत्याशी घोषित भी किया जा चुका है लेकिन अभी सुमावली में उनके अलाबा भाजपा के या बसपा के  किसी बगावती के कांग्रेस कंडीडेट बनने की बड़ी सम्भावना है ।

— जौरा विधान सभा क्षेत्र

चम्बल घाटी का असली युद्व जौरा की उस जमीन पर लड़ा जाएगा 1972 में जहां डकैतों ने भी अपनी बन्दूकें  गांधी की तस्बीर के सामने रख कर युद्ध विराम घोषित कर दिया था । जिला मुख्यालय पर कहें या मुरैना विधानसभा पर कहें दोस्ताना भाव से लडती सिंधिया और चौहान की सेनाएँ यहां असली आमने सामने की लड़ाई लड़ेगी  ।जिन कांग्रेसी विधायक बनबारी लाल शर्मा के निधन से जौरा सीट पर चुनाव की नौबत आई वे सिंधिया खेमे से जुड़े थे ऐसे में सिंधिया इस सीट पर फिर से अपना कब्जा चाहेंगे लेकिन भाजपा यहां से अपने पुराने कंडीडेट सूबेदार सिंह रजौधा को ही उतारना चाहेगी सिंधिया को मजबूरन सूबेदार सिंह का प्रचार करना होगा  बगावत से पहले जब अकेले जौरा के चुनाव की बात हो रही थी तब कांग्रेस ने बनबारी लाल शर्मा के लड़के को टिकट देने का मन बनाया था लेकिन बगावत में वह सिंधिया  के साथ चला गया अब भाजपा उसे टिकट देगी नही नतीजतन उसकी राजनीति की छुट्टी हो गई कांग्रेस के पास यहां कई चेहरे हैं जिनमे सिंधिया खेमे में रहे पहाड़गढ़ रियासत के उत्तराधिकारी उम्मेद सिंह बना ,सेटेलाइट से ट्रांसमिट होकर आए और आकर छा गए पंकज उपाध्याय ,मुरारी लाल दुबे ,और सबसे जबरदस्त  अगर बसपा छोड़ कर आ जाएं मनीराम धाकड़ को कांग्रेस अपना उम्मीदवार बना सकती है । सूबेदार सिंह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की व्यक्तिगत पसन्द हैं उनकी जीत भी शिवराज सिंह  चौहान की  नाक का  सबाल बन गया है  ।सूबेदार सिंह ने 2013 -18 के विधायक रहते इलाके में काम भी उन्होंने खूब किये जनता को उपलब्ध भी रहे सबकी मदद भी की लेकिन फिर भी 2018 में वे बुरी तरह हार कर तीसरे नम्बर पर पहुंच गए हाथी पर बैठे मनीराम धाकड़ उनसे जबर साबित हुए थे तब सबलगढ़ में मेहरबान सिंह रावत जिंदा थे आज पूरे इलाकें में  रावतों का कोई नेता नही है ऐसे में मनीराम धाकड़ और मजबूत साबित हो सकते हैं यहां से  भी मानवेन्द्र सिंह का नाम कांगेस से चर्चा में है लेकिन यह प्रचार मात्र है कहते हैं उनका अपना मन जौरा से लड़ने का है लेकिन जौरा ने उनके पिता बृन्दावन सिंह सिकरबार को ही 2 बार नही जिताया ।मानवेन्द्र किस पार्टी किस विधानसभा से लड़ेंगे यह उनके पिता तय करेंगे वे जिस सिकरबार परिवार से आते है उनमें से दो लोग और सुमावली से चुनाव लड़ते रहे हैं औऱ लड़ना  चाहते  हैं लेकिन सत्ता की चाहत में  उनकी पार्टी उनकी सीट का सौदा उनके कट्टर प्रतिद्वंदी से  करके उनका भविष्य चौपट कर चुकी है अभी उन्हें भी अपना  भविष्य तय  करना है ।भाजपा को लगता है कि वह  समर्पित निष्ठावान कार्यकर्ताओं की पार्टी है संगठन जिसे उम्मीदवार बना देगा  कार्यकर्ता उसकी  पालकी लेकर  चल देगा और उसे भोपाल तक पहुंचा आयेगा  ऐसे समर्पित  संघ के स्वयंसेवक और पार्टी के कार्यकर्ता 15 -16 साल  पहले हुआ  करते थे  सत्ता नें इनका काग्रेसी करण कर दिया है  चुनाव होने दो खुद देख लेना ।
आदर्श गुप्त

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