Wednesday, October 21, 2020
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कलमकार का दायित्व बोध  सकारात्मक और जागृत रहना चाहिए

-डॉ. सुनील त्रिपाठी निराला
      मानव के अंदर चेतना का प्रवाह लगातार होता रहता है यह शारीरिक और मानसिक अवस्था है इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह होती है कि यह प्रवाह किस दिशा की ओर जा रहा क्योंकि मानसिक प्रवाह को बदलने के लिए मार्गदर्शन देने के लिए सही दिशा में अग्रेषित करने के लिए मस्तिष्क में विवेक नाम का एक ड्राइवर होता है चालक होता है इस चालक का दायित्व रहता है कि वह मस्तिष्क में उठने वाली तरंगों को ऊर्जा से लबरेज रखें सकारात्मकता से भरपूर रखें और उसके अंदर परोपकार के कार्यों का समावेश बना रहे एक कलमकार की बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है वह चाहे साहित्यकार के रूप में हो चाहे पत्रकार के रूप में हो चाहे कलाकार के रूप में हो चाहे वैज्ञानिक के रूप में हो चाहे राजनेता के रूप में कलम कलम है उसका धर्म में लिखना अब उस कलम से क्या लिखा जा रहा है यह लिखने वाले की सोच लिखने वाले की स्थिति लिखने वाले की दिशा निर्देशन पर निर्भर रहता है कलम का सबसे अधिक प्रयोग साहित्यकार और पत्रकार करते हैं इस कड़ी में महत्वपूर्ण अंग के रूप में एक शिक्षक में शामिल है यह तीनों मिलकर के कलम का एक त्रिगुणात्मक स्वरूप तय करते हैं शिक्षक से हमको सीख मिलती है साहित्यकार उसी को विस्तारित करते हुए समाज तक पहुंचाता है और पत्रकार शिक्षक की सीट को साहित्यकारों द्वारा समाज तक फैलाने वाली प्रक्रिया का तटस्थ मार्गदर्शक होता है अगर गौर से देखा जाए तो एक पत्रकार शिक्षक और साहित्यकार दोनों का ही मार्गदर्शन चेतक तथा उनकी अवस्था का सटीक आकलन करने वाला प्रमुख स्तंभ है पत्रकार को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है यहां देखने वाली बात है कि लोकतंत्र प्रजातंत्र इसकी वास्तविकता क्या है इसके गुण धर्म क्या है जनता का जनता के द्वारा जनता के लिए लोकतंत्र जिस व्यक्ति के विकास के लिए व्यक्ति के उत्थान के लिए व्यक्ति की बुद्धि को सही दिशा में लगाने के लिए जितनी भी योजनाएं योजनाएं तैयार की जाती हैं उनके अंतिम स्वरूप में व्यक्ति या लोकेशन हम किसी भी नाम से पुकार लें उनकी आवश्यकताएं उनके मार्गदर्शन अवश्य शामिल रहते हैं यह अलग बात है लोकतंत्र प्रजातंत्र में लोक द्वारा द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि लोक तथा प्रजा की भावना की अवज्ञा करते हैं लोकतंत्र ढांचे के विलोपन की प्रक्रिया में एक दोषी के रूप में भाग लेते हैं जन भावनाओं का दोहन करते हैं इन सब बातों से हम एक स्वस्थ लोकतंत्र की अवधारणा से मुंह मोड़ सकते बनता है उसकी कलम से निकले हुए प्रत्येक शब्द में सकारात्मक ऊर्जा का दिखना चाहिए जो भी लिखा है उसके अंदर कालजई परिस्थितियों की आहट महसूस होनी चाहिए ऐसी होना चाहिए जो परिस्थितियां बदलने पर भी प्रभावी रहे और यह तभी संभव हो सकता है जब एक रचनाकार तटस्थ रहे सकारात्मक रहे राग से परे रहे विषम परिस्थितियों की वजह से यदि होता चला जाएगा एक पक्षी होता चला जाएगा तो वह अपनी कलम के साथ न्याय नहीं कर सकता और यह नाइंसाफी रचनाकार के लिए घातक है आने वाला कल उसे उसे कभी भी माफ नहीं करेगा परिस्थितियां विषम रहती हैं सम रहती हैं आवश्यक नहीं यह हर बार परिस्थितियां एक रचनाकार के अनुकूल ही हो तो इसका मतलब यह नहीं हुआ कि वह परिस्थितियों से भयभीत होकर उन परिस्थितियों का समर्थक बन जाए अथवा उन परिस्थितियों से नफरत करने लगे और इस हद तक नफरत करने लगे कि उन परिस्थितियों में भी जो कुछ अच्छा है उसकी भी अनदेखी कर दी उन परिस्थितियों में भी जो अच्छा है उसकी अनदेखी कर दी यह विचार एक तटस्थ रचनाकार के लिए उपयुक्त नहीं है अनादि काल से गोस्वामी तुलसीदास जी का कालखंड हूं चाहे महात्मा कबीर का कालखंड हूं चाहे रसखान की बात की जाए चाहे उन तमाम रचनाकारों की बात की जाए जिन्होंने परिस्थिति के विपरीत जाकर सकारात्मकता को अपने लेखन का मापदंड बनाया रचना काटता है तो उसके सामने इंसान रहना चाहिए इंसान की मूलभूत आवश्यकता है रहना चाहिए और उसकी पूर्ति के लिए कौन व्यक्ति जिम्मेदार है उस को जागृत करने का कार्य रचनाकार को करना चाहिए चाहे शासन हो चाय अधिकारी हो समाज का तथाकथित कोई भी ठेकेदार यदि वो जन उपयोगी कार्य में बाधक बन रहा है रचनाकार का धर्म बनता है कि वह उसे ललकारे उसके द्वारा उत्पन्न होने वाले खतरे से भयभीत होते हुए नपा के उत्थान के लिए अपना कार्य करता रहे उसे अपनी कलम से ऐसी कोई रचना ऐसा कोई सूफीवाद ऐसा कोई कथन नहीं करना चाहिए जिससे किसी को अनावश्यक कष्ट हो किसी का अनावश्यक नुकसान हो किसी को अनावश्यक पीड़ा के दौर से गुजर ना पड़े अच्छा बुरा हर जगह होता है झारखंड में हुआ है हर क्षेत्र में मौजूद है हर धर्म में मौजूद है हर सामाजिक व्यवस्था में यह तत्व मौजूद है कवि साहित्यकार कलमकार पत्रकार कलाकार की दृष्टि एक तटस्थ शक्ति होनी चाहिए उसका विवेक हंस की तरह होना चाहिए उसके अंदर मानवता के उदात्त गुण रहना चाहिए जब लिखने को बैठे तो उसके सामने इंसान होना चाहिए उस इंसान की जाती उस इंसान का धर्म उस इंसान का राष्ट्र उस इंसान की भाषा उस इंसान का क्षेत्र कदापि नहीं होना चाहिए क्योंकि अगर हमने उस इंसान को अपने नजरिए से देखना प्रारंभ कर दिया तो फिर हम एक सार्थक और अच्छे सजन से नहीं जुड़ सकते और यह कलम के प्रति अपराध है राष्ट्रकवि दिनकर ने लिखा है कि समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध पताका आशा यह नहीं होता है कि हम विसंगतियों से असमान तारों से विद्रोह से आंखें फेरना उनके बारे में विचार करना छोड़ दें उनको इंगित करना बंद कर दो तथा का आशय यह है कि अच्छा किया है और जो अच्छा नहीं है उसका कारण क्या है अच्छे ना होने के पीछे जिम्मेदार कौन हैं वह जिम्मेदार व्यक्ति अपने कर्तव्य का निर्वाह नहीं कर रहे हैं तो क्यों नहीं कर रही इन बातों को देखना और इस समस्या को निष्पक्ष भाव से पहुंचाना ही रचनाकार का दायित्व होता है वर्तमान का जो दौर है कोरोना आपदा की वैश्विक महामारी का द्वार है पूरा विश्वास है ऐसे समय में आ रहा है कि सच नहीं है उसको सच कहते परोसा जा रहा है जो झूठ नहीं है उसको झूठा सिद्ध करने की प्रयास किए जा रहे हैं यही स्थिति भयावह है इससे बचना होगा आफत होता आफत काल में व्यक्ति की परीक्षा होती है गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी लिखा है धीरज धर्म मित्र अरु नारी आपद काल परखिए चारी
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