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गणतंत्र दिवस: त्याग, बलिदान और संकल्प का पर्व 

गणतंत्र दिवस: त्याग, बलिदान और संकल्प का पर्व 

गणतंत्र दिवस: त्याग, बलिदान और संकल्प का पर्व

 – विनी वर्मा
आज हम गणतंत्र दिवस का महापर्व माना रहे है । किसी भी लोकतांत्रिक देश मे इससे बड़ा कोई उत्सव नही होता क्योंकि इसके जरिये कोई भी देश जनता द्वारा जनता की ओर से और जनता के शासन को स्वीकार करता है । यह सत्ता का अनूठा माध्यम होता है जिसमे शासक और शासित एक ही होते है और आत्म नियंत्रण से सत्ता व्यवस्था का संचालन किया जाता है ।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में इसका और भी ज्यादा महत्व रहा है । भारत के यदि पौराणिक आख्यानों को देखें तो पाएंगे कि भले ही हमारे देश की सत्ता राजा महराजाओं द्वारा संचालित रही हो लेकिन लोकतांत्रिक मूल्य यहां की आबोहवा मे बसे रहे है । शासक जनता के लिए काम करने के संकल्प के साथ सत्ता का संचालन करते थे और प्रजा उनका साथ देती थी । भगवान राम का राज्य हो,हरिश्चन्द्र का या फिर विक्रमादित्य का । ऐसे तमाम उद्धरण है जो देश की राज व्यवस्था की तरफ इंगित करते है कि वह जनता की भावनाओं और उनके हितों के अनुकूल होती थी ।
लेकिन कालांतर में यह व्यवस्था चरमराती गई । देश स्व शासन व्यवस्था से गुलामी के गर्त में जाता चला गया । पहले मुस्लिम और फिर अंग्रेज शासकों ने देश को लूटने का आधार बनाया और प्रजा को शोषण का।जरिया । यह बात भी सही है कि इन विदेशी आक्रांताओं को भारत की छाती पर मूंग दलने का मौका और किसी ने नही बल्कि सत्ता के मद में चूर हमारे की स्वार्थी और लालची राजाओं ने दिया । उन्होंने एक दूसरे विरोधी राजा के पतन के लिए इन विदेशी शासकों का साथ दिया और आपस मे लड़ते झगड़ते इन भारतीय रजवाड़ों की सत्ता छीनने का कुकृत्य विदेश से आये चंद क्रूर लुटेरे भारतीयों की मदद से करते रहे ।
भारतीय राजाओं के स्वार्थी,लालची और अपनी ही प्रजा के प्रति क्रूर हो जाने से प्रजा निराश हो गई । उसके मन मे एक बात घर कर गई कि राजा अब उनके कल्याण और रक्षा के लिए नहीं है । तभी तो तुलसी दास जी ने लिखा – कोई नृप होय हमे क्या हानि । यानी प्रजा का राजाओं से मोहभंग हो गया और देश गुलामी के गर्त में जाता चला गया ।
लेकिन जैसा कि सर्व विदित है कि भारतीय नभ मंडल गुलामी में बहुत दिनों तक सांस नही ले सकता । वह अपनी आज़ादी के लिए ब्याकुल हो उठा और 1857 में मंगल पांडे ,महारानी लक्ष्मी बाई ,तात्या टोपे आदि के साथ जनता ने देश के अलग अलग हिस्सों में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अपनी स्वतंत्रता की अलख जगाई । यह बात और है कि क्रूर अंग्रेजो ने हजारों लोगों का कत्ल कर इस असंगठित आंदोलन को दबा दिया लेकिन उन्हें नही पता था कि देश के लोगों की छाती में आज़ादी की आग धधकने लगी थी जो चंद्रशेखर आज़ाद,सरदार भगत सिंह,राज गुरु ,राम प्रसाद बिस्मिल ,असफाकउल्लाह खान जैसे हजारों लोग अपनी जान हथेली पर लेकर अंग्रेजी हुकूमत को भगाने के जतन में लग गए थे । आखिरकार महात्मा गांधी के रूप में देश को एक ऐसा फकीर आया जिसने पूरे देश के जेहन में आज़ादी का सपना सौंप दिया और सबको इस काम मे शामिल कर लिया ।  अंग्रेजो को लगता था वे क्रूरता से 1857 की तरह इस आग को भी ठंडी कर देंगे । लेकिन महात्मा गांधी ने उनकी तोप और तलवारों के आगे अपने भारतीय हथियार अड़ाए । इनका नाम था – सत्य और अहिंसा । इन हथियारों को लेकर सड़को पर आज़ादी का सपना लेकर सड़को पर उतरे जन सैलाव के सामने अंग्रेजो के सारे हथियार भोंथरे हो गए । आखिरकार 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजो को भारत की सत्ता से बेदखल होकर भागना पड़ा । मबतमा गांधी का पूर्ण स्वराज का सपना साकार हुआ । हमने हजारों साल की गुलामी की बेड़ियों को उखाड़ फेंका । फिर हमने गणतंत्र के रूप में शासन व्यवस्था चुनने का निर्णय लिया ।
26 जनवरी ही गणतंत्र दिवस क्यों
इसकी भी एक रोचक कहानी है । दरअसल 26 जनवरी 1929 को कांग्रेस का अधिवेशन हुआ । जिसमें पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अंग्रेजो के उपनिवेशिक शासन व्यवस्था के प्रस्ताव को खारिज करते हुए पूर्ण स्वराज का संकल्प दोहराया और इसकी पूर्ति के लिए पूर्ण आंदोलन तेज करने का आह्वान किया । यही वजह है कि जब देश 1947 मे आज़ाद हुआ तभी यह तय किया गया कि 26 जनवरी 1929 की निर्णायक तिथि को ही गणतंत्र दिवस के रूप में मनाएंगे ।  फिर 26 जनवरी 1950 को हमारे देश का संविधान अस्तित्व में आया । इसके पहले डॉ भीमराव अंबेडकर के नेतृत्व में बनी संविधान निर्माण  प्रारूप समिति ने कड़ी मेहनत करके 2 साल 11 महीनों और 18 दिन में संविधान का निर्माण किया । इस संविधान को विश्व का सर्वश्रेष्ट संविधान माना जाता है ।
हमने 26 जनवरी 1950 को अपने को गणराज्य घोषित कर लिया जो किसी व्यक्ति या संस्था के नही बल्कि अपने पवित्र संविधान के द्वारा शासित होता है । जनता खुद अपनी सत्ता चुनने के लिए स्वतंत्र है । लेकिन नई पीढ़ी को समझना होगा यह आज़ादी हमे लाखो लोगों के बलिदान और हजारों साल की असहनीय और अमानवीय गुलामी के बाद हासिल हुई है । यह हमारे पूर्वजों द्वारा अपने संघर्ष और बलिदान से हासिल किया गया नायाब तोहफा है अब इसकी हिफाजत करने का जिम्मा है । हमने संविधान में।एक धर्म और पंथ निरपेक्ष देश का संकल्प लिया है जिसमे सबको जाति पांत और अपनी धार्मिक आज़ादिया तो दी गई है लेकिन सबका एक संकल्प रखा गया है – सशक्त लोकतंत्र । मजबूत और विकसित देश । देश तभी विकास की राह पर निरंतर चलेगा जब इसमें हर भारतवासी की सक्रीय और ईमानदार भूमिका होगी । गणतंत्र दिवस पर हमें इस संकल्प को न केवल दोहराना होगा बल्कि अपनी मंशा,वाचा और कर्मणा से भी प्रकट करना होगा कि हम अपने संविधान के प्रति न केवल आदर रखेंगे बल्कि उसके एक एक शब्द का अक्षरशःपालन करते हुए अपने पूर्वजों द्वारा सौंपी गई स्वतंत्रता की थाती की पूरी निष्ठा से रक्षा करेंगे और देश को विकास पथ पर ले जाने में प्राणपण से जुटेंगे।
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