Wednesday, October 28, 2020
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा- इंटरनेट एक्सेस का अधिकार अनुच्छेद 19 के तहत बुनियादी हक

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट जम्मू-कश्मीर में संचार माध्यमों पर प्रतिबंधों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर शुक्रवार को फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी अहम है। इंटरनेट की स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 19 का हिस्सा है। स्वतंत्रता पर तभी रोक लगाई जा सकती है, जब कोई विकल्प न हो और सभी प्रासंगिक कारणों की ठीक से जांच कर ली जाए। कोर्ट ने आदेश दिया कि सरकार वे सभी आदेश दिखाए, जिनसे धारा 144 लगाई जाती है। जम्मू-कश्मीर प्रशासन एक हफ्ते के अंदर प्रतिबंध लगाने वाले सभी आदेशों की समीक्षा करे।

जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस सुभाष रेड्डी और जस्टिस बीआर गवई की बेंच ने मामले पर फैसला सुनाया। जस्टिस रमना ने चार्ल्स डिकन्स की टेल ऑफ टू सिटीज का जिक्र करते हुए फैसले की शुरुआत की। उन्होंने कहा, ‘‘कश्मीर ने हिंसा का लंबा इतिहास देखा है। हम यहां मानवाधिकार और सुरक्षा के मद्देनजर आजादी के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश करेंगे। यह कोर्ट की जिम्मेदारी है कि देश के सभी नागरिकों को बराबर अधिकार और सुरक्षा तय करे। लेकिन ऐसा लगता है कि स्वतंत्रता और सुरक्षा के मुद्दे पर हमेशा टकराव रहेगा।’’

अभिव्यक्ति की आजादी में ही इंटरनेट की स्वतंत्रता भी निहित
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा, ‘‘अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की आजादी में इंटरनेट का अधिकार भी आता है, तो अनुच्छेद 19(2) के तहत इंटरनेट पर प्रतिबंध के मामले में समानता होनी चाहिए। बिना वजह इंटरनेट पर रोक नहीं लगानी चाहिए। इंटरनेट पर रोक लगाने या इसे बंद करने के फैसले की न्यायिक समीक्षा होनी चाहिए।’’ धारा 144 लगाने के मुद्दे पर जस्टिस रमना ने कहा कि यह सिर्फ इमरजेंसी हालात देखते हुए ही लगानी चाहिए। सिर्फ असहमति इसे लगाने का आधार नहीं हो सकता। लोगों को असहमति जताने का हक है।

‘‘धारा 144 के तहत प्रतिबंध लगाने के लिए जम्मू-कश्मीर के अधिकारियों के आदेश देने की जरूरत है। इंटरनेट को एक तय अवधि की जगह अपनी मर्जी से कितने भी समय के लिए बंद करना टेलीकॉम नियमों का उल्लंघन है।’’

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