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जैन धर्म के आठवें तीर्थंकर भगवान चंद्रप्रभु यहां 17 बार आए थे.

जैन धर्म के आठवें तीर्थंकर भगवान चंद्रप्रभु यहां 17 बार आए थे.

सोनागिर में जैन धर्म के आठवें तीर्थंकर भगवान चंद्रप्रभु यहां 17 बार आए थे..!

सोनागिर में भजन संध्या एवं भगवान चंद्रप्रभु का महामस्तकाअभिषेक कल से होगा

सोनागिर में दो दिवासिय कार्यक्रम में भजन संध्या एवं महामस्तकभिषेक आयोजित होगा।

दतिया/ग्वालियर- श्री दिगंबर जैन सिद्धक्षेत्र सोनागिर संरक्षित कमेटी (न्यास) के तत्वाधान में 31 दिसंबर और 01 जनवरी तक नयेवर्श पर दो दिवसिया कार्यक्रम आयोजित किये जाऐगे। जिसमे 31 दिसंबर को भजन संध्या एवं 01 जनवरी को आचार्यश्री विशुद्ध सागर महाराज के सानिध्य में आठवें तीर्थंकर भगवान चंद्रप्रभु स्वामी का 1008 कलशो से महामस्तकाभिषेक कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा।

सोनागिर प्रबंध कमेटी के महामंत्री बालचंद्र जैन ने बताया कि जैन सिद्धक्षेत्र सोनागिर में 31 दिसंबर को रात्रि 7 बजे से ग्वालियर जैन समाज के गौरव संगीतकार शुभम जैन (सैमी) संगीत पार्टी एवं गायक दीक्षा जैन सागर, सीमा जैन माथुरा की भजन संध्या पहाड़ स्थित चंद्रप्रभु के दरबार में आयोजित कि जाऐगी। इसी के दौरान 01 जनवरी को नयेवर्ष की पहली किरण के साथ प्रात 7ः30 बजे से आचार्यश्री विशुद्ध सागर महाराज सहित 26 मुनिराजो के सानिध्य में जैन समाज के काॅफी श्रद्धालुओ के द्वारा प्राचीन भगवान चंद्रप्रभु का 1008 कलशो से महामस्तकाअभिषेक धूमधाम के साथ किया जाऐगा। जैन समाज के लोगो बडे़ उत्सव उमंग के साथ चंद्रप्रभु की दीपो से महाआरती और पूजन करेगे। नयेबर्श पर दिल्ली, आगरा, भोपाल, इंदौर, झाॅसी, मुरैना, भिंड, ग्वालियर, राजस्थान, गुना, पंजाब, हरियाण, आदि कई जगहो से काफी संख्या में श्रद्धालुगण पहुॅचने की संभावन है।

सोनागिर स्टेशन पर प्रतिदिन ये ट्रेन रूकती है

जैन समाज के प्रवक्ता सचिन आदर्श कलम ने बताया कि सोनागिर के लिए सोनागिर स्टेशन पर पठानकोट एक्सप्रेस, छतीगढ़ एक्सप्रेस एवं पेंसीजर स्थाई रूप से रूकती है। मध्यप्रदेश की डिपो बसे सोनागिर तिराहे पर यात्रियो की सुविधाओ के लिए हमेश रूकती है।

132 एकड़ में है 77 खूबसूरत मंदिर

जैन समाज के प्रवक्ता सचिन जैन आदर्श कलम ने बताया कि यहां पहाड़ी पर 132 एकड़ क्षेत्रफल में एक से बढ़कर एक 77 खूबसूरत मंदिर हैं। इनमें 57 नंबर का मंदिर मुख्य माना जाता है। मान्यता है कि आचार्य शुभ चंद्र और भर्तृहरि ने यहां रहते हुए कठिन तपस्या की। मंदिरों के इस परिसर को श्लघु सम्मेद शिखर भी कहा जाता है।

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