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सबके प्रिय थे बाबू राजेंद्र सिंह -राकेश अचल

ग्वालियर में एक जमाना था जब बाबू राजेंद्र सिंह और कांग्रेस एक-दूसरे के पर्याय थे .राजेंद्र सिंह जी के अचानक जाने की खबर से स्तब्ध हूँ और मेरी स्मृतियों में 48  साल पहले  के राजेंद्र बाबू आकर खड़े हो जाते हैं .लम्बे,ऊंचे कद के राजेंद्र बाबू ,जो सबको जीवन भर सहज,सुलभ रहे और खूब रहे .
बात शायद 1972  की है मै ग्वालियर में नया-नया आया था,हायर सेकेंडरी का छात्र था ,सिंधी कालोनी में रहता था .मै जब-जब महाराज बाड़ा आता तब-तब पोस्ट आफिस के नीचे बने गोदा जी के होटल के बाहर एक सफेद रंग की एम्बेस्डर कार को खड़ा देखता,इस कार पर लालबत्ती होती थी और जब ये कार वापस जाती थी तो इसमें एक लम्बे से आदमी के साथ बैठने के लिए लोगों में होड़ लगी रहती थी. बाद में पता चला की ये कार तब के मंत्री राजेंद्र बाबू की थी .
उस जमाने में महाराज बाड़ा का गोदा जी का होटल शहर के राजनेताओं,बुद्धजीवियों और कलाकारों का संगम स्थल होता था.राजेंद्र बाबू सबके प्रिय   थे.तब महाराज बाड़ा पर ही नगरनिगम का दफ्तर भी था.आम जनता यहीं अपने मंत्री से लेकर पार्षद को घेर सकती थी और अपने काम करा सकती थी .मैंने भी अपने राशनकार्ड के लिए राजेंद्र बाबू से मदद मांगी तो उन्होंने फटाफट मेरा राशनकार्ड बनवा   दिया .
राजेंद्र सिंह जी खानदानी कांग्रस थे.उनके पिता स्वर्गीय कक्का डोंगर सिंह पक्के गांधीवादी नेता थे.घोर श्रमजीवी और सरल,कक्का के ही सदगुण बाबू राजेंद्र  सिंह में रच-बस गए थे .वे अपनी पीढ़ी के अजातशत्रु थे. शहर में अंग्रेजी विरोधी आंदोलन हो सामंतवाद के खिलाफ कोई आंदोलन बाबू राजेंद्र सिंह सबके अगुआ होते थे .महाराज बाड़ा  से जयाजीराव सिंधिया की मूर्ति हटाने का आंदोलन हो या अंग्रेजी हटाओ आंदोलन सबमें उनकी हाजरी और मदद रहती थी .
मुझे याद है की बाबू राजेंद्र 1972  में मुरार विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के टिकिट पर चुनाव लड़े थे तब उनका मुकाबला जनसंघ के श्री नरेश जौहरी से था .जौहरी को जिताने के लिए पूरा संघ और महल लगा था लेकिन जीते तो राजेंद्र सिंह ही.उन्होंने जौहरी को 5264  मतों से पराजित किया.राजेंद्र सिंह को तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाशचंद्र सेठी और बाद के मुख्यमंत्री श्री श्यामाचरण शुक्ल बेहद पसंद करते थे. पहली बार चुने जाने के बावजूद वे उपमंत्री बनाये गए और उन्हें शायद लोनिवि विभाग दिया गया था .
मंत्री बनने के बावजूद राजेंद्र सिंह जी का अधिकांश समय महाराज बाड़ा पर ही बीतता था .आज के ज़माने के मंत्रियों की तरह तब कोई जाकिट शाही   नहीं चलती थी.सादा खादी का कुर्ता-पायजामा पहने राजेंद्र बाबू अपने कद-काठी के कारण दूर से ही नजर आ जाते थे .कांग्रेस ने उन्हें 1977  में दोबारा मुरार से ही अपना प्रत्याशी बनाया लेकिन आपातकाल के बाद देशव्यापी इंदिरा विरोधी लहर में राजेंद्र बाबू भी जनतापार्टी के माधव शंकर इंदापुरकर से चुनाव हार गए ,लेकिन पार्टी में उनका महत्व कभी  कम नहीं हुआ.कांग्रेस ने 1980  में उन्हें नवगठित भाजपा के नारायण कृष्ण शेजवलकर के खिलाफ अपना प्रत्याशी     बनाया ,लेकिन वे जीत नहीं सके .
राजेंद्र बाबू को अपने शहर और अपने शहर की जनता से बेहद प्यार था.राजनीति इसमें कभी आड़े नहीं आती थी .शहर में किसी भी दल के छोटे या बड़े नेता के यहां शादी हो या नामकरण संस्कार यदि राजेंद्र बाबू को न्योता गया है तो वे पहुंचेंगे जरूर .सर्दियों में कानों पर मफलर लपेटे राजेंद्र बाबू अपने चेहरे पर एक स्निग्ध मुस्कान लिए सबके दरवाजे पर नजर आते थे .गोदा जी के होटल से ही मै उनके संपर्क में आया और ये सम्पर्क कब पारिवारिक रिश्ते में बदल गया ,मुझे पता ही नहीं चला .
बात 1986  की है,मेरे पुत्र का नामकरण संस्कार होना था,मै एक पिछड़े मोहल्ले में रहता था ,समस्या थी की मै समारोह कहाँ करू ? राजेंद्र बाबू ने फौरन अपने मित्र शीतला सहाय से कहा ,और मैंने उनके जवाहर कालोनी स्थित मकान से अपने बेटे का नामकरण संस्कार किया,वे पूरे समय अभिभावक की तरह वहां मौजूद रहे .ऐसे अनेक प्रसंग शहर के सैकड़ों लोगों के साथ जुड़े होंगे .
राजेंद्र सिंह जी सामंतवाद के धुरविरोधी थे किन्तु जब 1984  में कांग्रेस ने माधवराव सिंधिया को ग्वालियर से पार्टी का प्रत्याशी बनाया तो वे मन मारकर पार्टी के काम के लिए निकले ,बाद में वे सिंधिया के साथ भी चुनाव प्रचार करने गए.बाबू राजेंद्र सिंह के लिए कांग्रेस पार्टी सबसे ऊपर थी .सिंधिया के साथ आरम्भ में उनके रिश्तों में खटास भले रही  हो लेकिन बाद में एक कांग्रेसी के नाते वे हमेशा साथ-साथ रहे और ये रिश्ता बाद में फलीभूत भी हुआ.कांग्रेस ने उनके बेटे अशोक सिंह को न केवल संगठन में मौक़ा दिया अपितु लोकसभा के अनेक चुनाव भी लड़ाये.
बाबू राजेंद्र सिंह का घर देश बाहर के कांग्रेसियों के लिए आश्रम जैसा था. मुझे याद नहीं आता की यदि कोई कांग्रेसी शहर में आया हो और उनके घर न गया हो.एक समय तो सिंधिया विरोधी तमाम कांग्रेसी नेता राजेंद्र सिंह जी के घर ही जमघट लगाते थे,राजेंद्र बाबू को इससे कभी कोई परेशानी भी नहीं होती थी. मप्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह रहे हों या दिग्विजय सिंह सबके लिए राजेंद्र बाबू समान रूप से प्रिय थे .
राजेंद्र बाबू ने राजयसभा के लिए चुने गए तत्कालीन क़ानून मंत्री हंसराज भारद्वाज से अपने पारिवारिक रिश्ते का लाभ अपने शहर और जिले को खूब दिलाया. हंसराज जी की अधिकाँश सांसद निधि बाबू राजेंद्र सिंह जी की मर्जी से ही खर्च होती थी .राजेंद्र सिंह जी ग्रामीण इलाके का सबसे जयादा ख्याल रखते थे .पिछले दिनों बाबू जी से अंतिम भेंट उनके पिता कक्का डोंगर सिंह जी की स्मृति में आयोजित भोज पर हुई थी .वे अपने यहां आमंत्रित हर   व्यक्ति से निजी तौर पर मिलते थे और खैर-खबर लेते थे.हर कोई उन्हें अपने निकट मानता था .बाबू जी के निधन से ग्वालियर में कांग्रेस के एक गांधीवादी युग का अंत हो गया है .मै उनकी स्मृतियों को विनम्र श्रृद्धांजलि अर्पित करता हूँ /
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@ राकेश अचल

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