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थोड़ी सफलता के बाद भी कॉंग्रेस में तेज होगा एकता में अनेकता का राग

प्रसंगवश / देव श्रीमाली 
ग्वालियर। भारतीय जनता पार्टी के लिए प्रदेश के नतीजे भले ही उतने रोचक नहीं हों जितने पिछले चौदह वर्षों से लगातार आते रहे है। भाजपा का चौदह साल का शासन पूरा।  इस दौरान प्रदेश में हुए विधानसभा हो,लोकसभा हो,पंचायत से लेकर शहरी निकायों के चुनाव हो ,भाजपा को क्लीन स्वीप मिलता रहा है। उपचुनावों में कॉंग्रेस को मिली इक्का – दुक्का सांयोगिक जीतों को छोड़ दें तो  स्थिति बद से बदतर ही होती रही है। इस लिहाज से सोलह अगस्त को आये परिणाम कॉंग्रेस को थोडी राहत देते और भाजपा खासकर शिवराज सिंह के लिए अलार्म बजाते दिख रहे है। कॉंग्रेस ने जहाँ अपनी सीटें दुगनी कर लीं वहीँ भाजपा से कई सीटें छीनी वहीँ भाजपा  परिणामो में अपने बड़े नंबर होने की भरपाई सिर्फ उन्ही सीटों को जीतकर कर पायी जहाँ चुनाव के पीला तक बसपा ,सपा,माकपा या निर्दलीय काबिज थे। नरसिंहपुर नगर पालिका चुनाव का परिणाम भाजपा के लिए और भी चौंकाने वाला है जहाँ कॉंग्रेस की नपा  अध्यक्ष के खिलाफ भाजपा पार्षदों के प्रयासों  खाली कुर्सी भरी कुर्सी का चुनाव करवाया गया गया था और वहां पहले से काबिज कॉंग्रेस अध्यक्ष दुबारा भारी मतों से विजयी रहीं। इस तरह से कॉंग्रेस के लिए चुनाव थोड़ी ऑक्सीजन देते है।
लेकिन इन चुनाव परिणामो से क्या कॉंग्रेस एकता  की राह पर चल सकेगी ? शायद नहीं। वजह सफलता का क्षेत्रीय प्रभाव। कॉंग्रेस क्षत्रपों में बंटी है। यहाँ सरकार आने के आसार भले ही न बन पाएं लेकिन कॉंग्रेस के नेता एक नेता के रूप में चुनाव लड़ने पर कदापि सहमत नहीं है। ज्योतिरादित्य सिंधिया ,कमल नाथ ,अरुण यादव ,सुरेश पचौरी औरअजय सिंह राहुल भैया मुख्यमंत्री पद के सशक्त दावेदार है और उनमें से कोई किसी दुसरे की दावेदारी खुलकर स्वीकार करने को राजी नहीं है। सिंधिया को छोड़कर खुलकर कोई दावेदारी के लिए भी तैयार नहीं। कमलनाथ महीनो से भोपाल में अपना बँगला सजवा रहे हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया प्रदेश भर में दौरा कर रहे है लेकिन अपने गढ़ में हो रहे नपा चुनावों में प्रचार तो दूर अपने समर्थको को एकजुट करने के लिए बैठक करने के लिए भी समय नहीं निकाल पाए।
जो परिणाम आये है वे कॉंग्रेस में एकता  कम घमासान ज्यादा लाएंगे। इन चुनाव परिणामो से बड़ी सफलता कमलनाथ के हाथ लगी गई। कमलनाथ अपने इलाके की अस्सी फीसदी सीटें कॉंग्रेस के लिए जिताने में सफल रहे है।  उन्होंने इस बार इसके लिए भाजपा की ही तर्ज पर मेहनत भी की। बैठकें की ,सभाएं की,रोड शो भी किये। नतीजे भी अच्छे आये। महाकौशल में भी वे अपने प्रभाव वाले इलाकों में जिताने में कामयाब रहे। विंध्य और मालवा में मिश्रित परिणाम मिले लेकिन सबसे करारी हार का सामना कॉंग्रेस को सिंधिया  के गढ़ ग्वालियर चम्बल में करना पड़ा। इस अंचल में ग्वालियर में एक डबरा नगर पालिका अध्यक्ष के पद पर और चम्बल में दो ,मुरैना जिले के कैलारस में नपा अध्यक्ष और भिंड जिले के लहार विधानसभा क्षेत्र के आलमपुर में एक वार्ड में पार्षद  पद के लिए उपचुनाव हुआ। यह इलाका दिग्विजय समर्थक डॉ गोविंदसिंह का है। उन्होंने  पार्षद  का चुनाव भी पूरी ताकत से लड़ा और जिताने में कामयाब रहे।
डबरा नगर पालिका चुनाव भाजपा पहली बार जीती।  यह इलाका   सिंधिया के प्रभाव क्षेत्र का है। विपरीत  परिस्थित्तियों में भी दो बार से यहाँ से कॉंग्रेस की विधायक इमरती देवी विधायक है जो खालिस सिंधिया समर्थक है। उन्ही की रिश्तेदार  को  नपा का  टिकिट दिया गया जिनकी जमानत जप्त हो गयी। कहा जा रहा है कि यहाँ के पुराने कॉंग्रेसियों को नए कॉंग्रेसियों ने हासिये पर डाल दिया है ।  सिंधिया  की आड़ में उनसे आपसी संवाद तक खत्म कर दिया। नतीजा यह है कि  मोदी लहर में भी लोकसभा और भाजपा को जिताने वाली डबरा में कॉंग्रेस अपनी जमानत गँवा बैठी। इस परिणाम को लेकर सिंधिया के प्रतिद्वंद्वी उनकी दावेदारी पर सवाल खड़े करेंगे ,लिहाजा साफ़ है अभी कॉंग्रेस में एकता में अनेकता का राग और भी शिद्दत से गाया जाने वाला है।

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