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सारे जहाँ से अच्छा इसलिए है हिन्दोस्तान हमारा

आज स्वतंत्रता दिवस है। आज़ादी के इन सत्तर सालों में देश खान से कहाँ तक फैला ?विश्लेषण कर रहे है वरिष्ठ पत्रकार और इंडिया शाम तक के समूह सम्पादक – देव श्रीमाली 

आज हम सत्तरवां  स्वतंत्रता दिवस और आज़ाद भारत की इकहत्तरवीं वर्षगाँठ मना रहे है। वर्षगाँठ का दिन निसंदेह उत्सव मनाने का दिन होता है कदाचित  यह आत्मविश्लेषण  का दिन भी होता है। हम 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजो की गुलामी से आज़ाद हुए। लेकिन यह हमारे लिए सिर्फ अंग्रेजो की गुलामी से आज़ादी  बल्कि शताब्दियों या यूं कहें कि शह्स्त्रब्दियों की गुलामी से मुक्ति मिली है। भारतीय इतिहास पर नज़र डालें तो हम सदैव से सामंतो के गुलाम रहे फिर मुसलमान और फिर अंग्रेज हमारे शासक बन गए। इतनी लम्बी गुलामी ने हमारी रगों में स्वतंत्रता के विरोध के कण ही नष्ट कर दिए थे। लेकिन  निराशा में आशा की किरण निकली 1857 में जब मंगल पांडेय और महारानी  लक्ष्मी बाई ने  अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाई। बलिदान दिया। तब भले ही इस आवाज को अंग्रेजी हुकूमत ने दबा दिया लेकिन जनमत के कानो में यह गूंजती रही। शहीद भगत सिंह ,चंद्र शेखर आज़ाद ,राम प्रसाद बिस्मिल जैसे अगणित  के बलिदानो और महात्मा गांधी के प्रति जन विश्वास ने स्वतंत्रता की चिंगारी को दावानल में तब्दील का दिया जिसकी परिणति 15 अगस्त 1947 को हुई जब यूनियन जेक को हमेशा  के लिए भगाकर हमने भारत के नील बितान पर हमारा राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा लहराने लगा।

गांधी ने जहाँ हमें  पराधीनता से आज़ादी दिलाई वहीँ पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू  ने अपनी सरकार की अवधारणा  का अहसास कराया। ट्रैन ,सड़को ,अस्पतालों और स्कूलों के जरिये देश को जोड़ने का काम किया। डॉ आंबेडकर के जरिये छूआछूत ,भेदभाव और और गैर बराबरी के जन व्यवहार से आज़ादी दिलाने की शुरुआत की।लालबहादुर शास्त्री ने  लगातार भुखमरी से जूझ रहे भारत को खाने में आत्म निर्भर बनाने और सशक्त राष्ट्र के निर्माण के  लिए जय जवान – जय किसान का नारा  बुलंद किया। इंदिरा गांधी ने बैंको का राष्ट्रीयकरण कर  पैसा देश के विकास में लगाने का क्रांतिकारी निर्णय लिया। पकिस्तान का विभाजन कराया  अनुशासित शासक के रूप में अपनी पहचान बनायी। हालाँकि उन्होंने आपातकाल जैसा लोकतंत्र विरोधी कदम भी उठाया जिसका खामियाजाभी उन्हें भुगतना पड़ा लेकिन पंजाब को आतंकवाद से मुक्त कराने में उन्हें अपने प्राणो का बलिदान भी करना पड़ा। राजीव गांधी ने देश को इक्कीसवी सदी का भारत देने की कोशिश की वहीँ अटलबिहारी बाजपेयी ने प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना और स्वर्णिम चतुर्भुज जैसे मूलभुत इंफ्रास्ट्रक्चर के काम किये जिनके कारण उनका योगदान भुलाया नहीं जा सकता। इसके अलावा सभी प्रधानमंत्रियों ,सरकारों और नागरिकों ने अपनी तईं देश को आगे ले जाने में मदद की। किसी के भी योगदान को कमतर आंकना इतिहास के साथ नाइंसाफी होगी जो एक  पाप जैसा है।
हमारी यह स्वतंत्रता अनेक बलिदानो और बुद्धिमान लोगों कीसोच समझ,करोड़ों देश वासियों के त्याग से मिली है। हमारे लिए गर्व की बात है कि हमारे साथ आज़ाद हुए दुनिया के बाकी देश चाहे वह पकिस्तान हो ,अफगानिस्तान आय फिर अन्य एशियन देश आज विश्व में कही कोई हैसियत नहीं रखते लेकिन चाहे रसूख  की बात हो , मेघा सम्पदा या विकास की कोई भी भारत के आगे कहीं नहीं ठहरता। आज हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी  की प्राचीर से न्यू  इंडिया बनाने  का जो सन्देश दिया वह  आने वाले भारत का सन्देश देता है। भारत उस दिशा में चल भी निकला है। लेकिन अभी बहुत कुछ होना बाकी है जिन चिंताओं का जिक्र प्रधानमंत्री  ने भी किया। भारत विभिन्नता का देश है यहाँ धार्मिक उन्माद के लिए कोई जगह नहीं है। इस पर रोक  लगाना  सरकार के सामने चुनौती है।  अभी भी इलाज़ के अभाव में बच्चे मर रहे है ,इन पर नियंत्रण ,सबको रोटी  रोजगार देने जैसी आज़ादी की अभी भी दरकार है लेकिन निराशा की कोई बात नहीं।सरकारें इन पर सोच  भी रहीं है और  पास वोट  इन्हे सोचने के लिए  बाध्य करने का औजार भी है।
आओ आज स्वत्नत्रता के इस जन्मदिन के मौके पर हम एक सहिष्णु ,विकसित और समभाव की मंशा वाली परम्पराओं को अक्षुण्ण रखने का संकल्प लें। सभी  को हार्दिक बधाई।

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